उत्तर प्रदेश में करीब 20 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं। ये मतदाता पूरे 403 विधानसभा सीटों में से 143 सीटों पर सीधा असर डालते हैं। राज्य की 70 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम उम्मीदवार अपने दम पर जीत हासिल कर लेते हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में 24 मुस्लिम विधायक जीते थे। वहीं 2022 के चुनाव में 34 मुस्लिम प्रत्याशी जीतकर विधानसभा पहुंचे। समाजवादी पार्टी मुसलमानों को अपना कोर वोट बैंक मानती है।
अखिलेश यादव मुसलमानों के मुद्दों पर सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ते। बहुजन समाज पार्टी 2007 की तरह एक बार फिर मुसलमानों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है। बहुजन समाज पार्टी ज्यादा से ज्यादा टिकट मुस्लिम उम्मीदवारों को देने की रणनीति पर काम कर रही है। खासतौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी सक्रिय है। कांग्रेस समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने की तैयारी में है और वह भी मुस्लिम वोटरों को रिझाने की कोशिश कर रही है।
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AIMIM का प्लान क्या है?
ऑल इंडिया इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) भी इसी कोशिश में है। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी मुस्लिम बहुल सीटों पर जोर दे रही है। पार्टी का पूरा संगठन इन सीटों पर फोकस कर काम कर रहा है।
कांग्रेस का वोट बैंक कैसे खिसक गया?
आजादी के बाद से 1990 के दशक तक मुस्लिम मतदाता कांग्रेस के परंपरागत वोटर थे। राम मंदिर आंदोलन के बाद वे कांग्रेस से दूर हो गए। इसके बाद मुलायम सिंह यादव उनकी पहली पसंद बने।
किसका साथ दे रहे हैं मुसलमान?
2007 में बहुजन समाज पार्टी ने मुसलमानों को ज्यादा टिकट दिए और पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली। 2012 के चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं ने 60 प्रतिशत वोट समाजवादी पार्टी को और 40 प्रतिशत बसमाजवादी पार्टी को दिए, जिससे समाजवादी पार्टी की सरकार बनी।
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2022 में भी कामयाब होंगे अखिलेश यादव?
2022 के विधानसभा चुनाव में मुसलमान पूरी तरह समाजवादी पार्टी के साथ एकजुट हो गए। इसका फायदा अखिलेश यादव को मिला और समाजवादी पार्टी 47 सीटों से बढ़कर 111 सीटों पर पहुंच गई। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी मुसलमान समाजवादी पार्टी के साथ रहे, जिसकी वजह से समाजवादी पार्टी ने प्रदेश में 37 सीटें जीतीं।
किन जिलों पर है सियासी दलों का जोर?
सहारनपुर, मुरादाबाद, रामपुर, संभल, बिजनौर, मेरठ, अमरोहा, बहराइच, बरेली, बुलंदशहर, मुजफ्फरनगर और रुहेलखंड व अवध के कई जिलों में मुसलमानों की आबादी 30 से 50 प्रतिशत है। इन इलाकों की विधानसभा सीटों पर अगर एक ही मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव लड़ता है तो उसे हराना लगभग नामुमकिन हो जाता है।