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दिव्या मित्तल ने क्यों चुनी मिर्जापुर सदर विधानसभा, समीकरण और रणनीति क्या है?

मिर्जापुर सदर विधानसभा सीट से पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल ने अपनी नवगठित जननीति भारत पार्टी से चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है।

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पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल। (Photo Credit: DivyaMittal)

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उत्तर प्रदेश में पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल की सियासी एंट्री ने मिर्जापुर सदर विधानसभा सीट को चर्चा में ला दिया है। प्रशासनिक सेवा छोड़कर राजनीति में उतरीं दिव्या मित्तल ने अपनी नई पार्टी 'जननीति भारत पार्टी' के जरिए 2027 का विधानसभा चुनाव लड़ने का एलान किया है।

 

उन्होंने मिर्जापुर सदर सीट को चुना है, जहां जातीय समीकरण चुनावी नतीजों में अहम भूमिका निभाते हैं। इस सीट पर वैश्य यानी बनिया समाज के मतदाताओं की संख्या करीब डेढ़ लाख से अधिक बताई जाती है, जो कुल मतदाताओं का 30 फीसदी से ज्यादा हिस्सा माने जाते हैं। इसके अलावा ब्राह्मण, मुस्लिम, दलित, यादव, बिंद, निषाद, मौर्य, पटेल और कायस्थ समाज के मतदाता भी चुनावी गणित को प्रभावित कर सकते हैं।

 

ऐसे में सवाल है कि क्या दिव्या मित्तल सामाजिक समीकरणों को अपने पक्ष में कर पाएंगी या बीजेपी के मौजूदा विधायक रत्नाकर मिश्रा और सपा के पुराने नेता कैलाश नाथ चौरसिया के सामने उनकी राह मुश्किल होगी?


मिर्जापुर सदर सीट पर वैश्य समाज को सबसे प्रभावशाली मतदाता वर्गों में गिना जाता है। यहां वैश्य मतदाताओं की संख्या डेढ़ लाख से अधिक है। इसी वजह से इस वर्ग का समर्थन किसी भी उम्मीदवार के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि, केवल जातीय समीकरण के दम पर चुनाव जीतना आसान नहीं है। दिव्या मित्तल को व्यापारियों और वैश्य समाज के साथ दूसरे वर्गों का समर्थन भी हासिल करना होगा।

 

ब्राह्मण मतदाता 50 हजार से अधिक हैं। मुस्लिम मतदाताओं की संख्या भी 50 हजार से ज्यादा बताई गई है। अनुसूचित जाति के मतदाता करीब 40 से 45 हजार हैं, जबकि यादव समाज के मतदाताओं की संख्या 20 से 25 हजार के आसपास मानी जाती है। इसके अलावा बिंद, निषाद, मौर्य और पटेल समाज को मिलाकर करीब 80 हजार मतदाता बताए जाते हैं। कायस्थ समाज के मतदाता लगभग 10 से 15 हजार हैं, जबकि चौरसिया समाज के मतदाताओं की संख्या 10 हजार से कम बताई जाती है।

जननीति भारत पार्टी बनाकर  बढ़ाई सियासी हलचल

दिव्या मित्तल ने किसी स्थापित राजनीतिक दल में शामिल होने के बजाय अपनी पार्टी 'जननीति भारत पार्टी' के जरिए चुनाव लड़ने का फैसला किया है। इससे उन्हें अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने का अवसर मिलेगा, लेकिन संगठन खड़ा करने की चुनौती भी सामने होगी।

 

बीजेपी और सपा के पास पहले से बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं का नेटवर्क, स्थानीय नेताओं की टीम और चुनावी अनुभव है। इसके मुकाबले जनता शक्ति पार्टी को क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत करनी होगी। दिव्या मित्तल को जनता के बीच जाकर यह बताना होगा कि उनकी पार्टी विकास, रोजगार, व्यापारियों की समस्याओं, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर क्या अलग योजना लेकर आएगी।

 

यह भी पढ़ें: UP में पाल समाज पर कब्जे की जंग! 2027 से पहले BJP, सपा, BSP में क्यों मची होड़?

मिर्जापुर सदर सीट का इतिहास

मिर्जापुर सदर विधानसभा सीट का राजनीतिक इतिहास काफी दिलचस्प रहा है। देश के मौजूदा रक्षा मंत्री और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने वर्ष 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर इसी सीट से विधानसभा चुनाव जीता था। इस जीत ने उनकी राजनीतिक यात्रा को नई दिशा दी। इस सीट पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी के परिवार से जुड़े नेताओं ने भी चुनाव लड़ा।

 

ललितेश पति त्रिपाठी और राजेश पति त्रिपाठी ने यहां अपनी राजनीतिक किस्मत आजमाई, लेकिन उन्हें जीत नहीं मिली। मिर्जापुर जिले ने फूलन देवी, बालकुमार पटेल और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल जैसे नेताओं को भी राष्ट्रीय राजनीति में पहचान दिलाई है। धार्मिक रूप से मां विंध्यवासिनी धाम के कारण मिर्जापुर का विशेष महत्व है। राजनीतिक दृष्टि से भी यह क्षेत्र पूर्वांचल की अहम सीटों में गिना जाता है। जिले में मिर्जापुर नगर, मझवां, चुनार, मड़िहान और छानबे समेत पांच विधानसभा क्षेत्र हैं।

2002 से 2012 तक सपा का कब्जा, 2017 से BJP का दबदबा

मिर्जापुर नगर विधानसभा सीट पर वर्ष 2002 से 2012 तक सपा का दबदबा रहा। सपा के कैलाश नाथ चौरसिया लगातार तीन बार विधायक बने। उस दौर में इस सीट को सपा की मजबूत सीटों में गिना जाता था। लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक समीकरण बदल गए। बीजेपी के रत्नाकर मिश्रा ने कैलाश नाथ चौरसिया को हराकर सीट पर कब्जा किया। इसके बाद 2022 के चुनाव में भी रत्नाकर मिश्रा ने जीत दर्ज की और बीजेपी ने अपना दबदबा बरकरार रखा।

 

अब 2027 के चुनाव से पहले दिव्या मित्तल की एंट्री से मुकाबले में एक नया चेहरा जुड़ गया है। यदि वह मजबूत संगठन और व्यापक सामाजिक समर्थन तैयार कर पाती हैं तो चुनावी लड़ाई दिलचस्प हो सकती है। हालांकि, बीजेपी के मौजूदा विधायक की स्थिति और सपा के पुराने जनाधार को देखते हुए उनकी राह आसान नहीं मानी जा सकती।

क्या वैश्य वोटों के सहारे BJP-सपा को चुनौती देंगी दिव्या मित्तल?

दिव्या मित्तल के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वह वैश्य मतदाताओं की बड़ी संख्या को अपने समर्थन में बदल पाएंगी। इसके साथ ही उन्हें ब्राह्मण, मुस्लिम, दलित, यादव, पटेल, मौर्य, बिंद और निषाद समेत दूसरे समुदायों के बीच भी अपनी पकड़ बनानी होगी। बीजेपी के पास लगातार दो चुनाव जीतने का आधार है, जबकि सपा के कैलाश नाथ चौरसिया का इस सीट पर पुराना राजनीतिक अनुभव और जनाधार रहा है। ऐसे में दिव्या मित्तल को दोनों स्थापित दलों के मुकाबले अपनी अलग जगह बनानी होगी। उनकी प्रशासनिक पृष्ठभूमि पहचान दिला सकती है, लेकिन जीत के लिए स्थानीय संपर्क, मजबूत संगठन और मतदाताओं का भरोसा जरूरी होगा।

 

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2027 में मिर्जापुर सदर सीट पर मुकाबला होगा दिलचस्प?

दिव्या मित्तल के चुनाव लड़ने के एलान के बाद मिर्जापुर सदर सीट पर नए समीकरण बनने की संभावना है। बीजेपी अपना राजनीतिक आधार बचाने की कोशिश करेगी, जबकि सपा पुराने जनाधार को वापस पाने की रणनीति बना सकती है। दूसरी ओर, दिव्या मित्तल अपनी नई पार्टी के जरिए तीसरा विकल्प पेश करने की कोशिश करेंगी।

 

फिलहाल चुनाव में उम्मीदवारों की अंतिम स्थिति और गठबंधनों की तस्वीर स्पष्ट होने के बाद ही मुकाबले का वास्तविक स्वरूप सामने आएगा। लेकिन दिव्या मित्तल की एंट्री ने मिर्जापुर सदर सीट पर वैश्य मतदाताओं की भूमिका, जातीय समीकरण और बीजेपी-सपा के पुराने मुकाबले को फिर चर्चा में ला दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या डेढ़ लाख से अधिक बताए जाने वाले वैश्य मतदाताओं का समर्थन और दिव्या मित्तल की प्रशासनिक छवि उन्हें विधानसभा तक पहुंचा पाएगी, या मिर्जापुर सदर सीट पर बीजेपी और सपा का पुराना मुकाबला ही हावी रहेगा?

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