जनता दल यूनाइटेड (JDU) के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा के पटना स्थित आवास पर बड़ी बैठक चल रही है। बैठक में संजय झा के अलावा मंत्री विजय चौधरी और सीएम नीतीश कुमार के करीबी एमएलसी संजय गांधी भी मौजूद हैं। खबर यह है कि नीतीश कुमार राज्यसभा जाएंगे और केंद्र की राजनीति का हिस्सा बनेंगे। हालांकि पार्टी ने आधिकारिक तौर पर ऐसा कोई ऐलान नहीं किया है। मगर पटना के अलावा देशभर के सियासी गलियारे में यह खबर तैरने लगी है।
तमाम अटकलों के बीच केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने इन दावों का खंडन किया और कहा, 'होली पर ऐसे चुटकुले आम बात हैं। नीतीश कुमार जी हमारे मुख्यमंत्री हैं।' उधर, नीतीश कुमार के करीबी और जेडीयू एमएलसी संजय गांधी का कहना है क राज्यसभा में जाना है या नहीं जाना, यह नीतीश कुमार का फैसला होगा। मुख्यमंत्री (नीतीश कुमार) खुद तय करेंगे। चुनाव को देखते हुए हमने संगठन को मजबूत करने के लिए बैठक की थी।
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कैसा रहा नीतीश कुमार का ट्रैक रिकॉर्ड?
बिहार की सियासत में नीतीश कुमार को बदलने की कयासबाजी पहले भी कई बार लगाई जा चुकी है। हालांकि नीतीश ने समय से पहले पला बदल हर कोशिश का करारा जवाब दिया। 2013 में बीजेपी से यह कहते हुए रिश्ते तोड़ दिए कि हम सांप्रदायिक ताकतों से हाथ नहीं मिलाएंगे। महागठबंधन के तहत चुनाव लड़ा और कांग्रेस-आरजेडी के सहयोग से मुख्यमंत्री बने। 2017 में यह गठबंधन टूट गया।
समय को भाप कर चाल चलते हैं नीतीश
दोबारा बीजेपी से हाथ मिलाया और आरजेडी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया। 2022 में देशहित का हवाला दिया और दोबारा बीजेपी से रिश्ता तोड़ा। राष्ट्रीयस्तर पर महागठबंधन खड़ा करने की पुरजोर कोशिश की। मगर लोकसभा चुनाव 2024 से पहले बीजेपी के साथ सरकार में सहयोगी बने। कांग्रेस और आरजेडी को किनारे कर दिया। मतलब साफ है कि नीतीश कुमार समय और परिस्थिति के हिसाब से अपनी चाल चलते हैं। उन पर बीजेपी के साथ जुड़े रहने या साथ छोड़ने का कोई नैतिक दबाव नहीं होता है। वे खुलकर फैसला लेने वाले नेता हैं।
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क्या अबकी बार है पलटी मारने वाला समीकरण?
विधानसभा चुनाव 2025 में जेडीयू को कुल 85 सीटों पर जीत मिली है। आरजेडी 25, कांग्रेस छह, ओवैसी की पार्टी 5, दो सीटों पर माले, इंडियन इंक्लूसिव पार्टी और माकपा को एक-एक सीट पर जीत मिली है। अगर इन सभी सीटों को मिला दिया जाए तो आंकड़ा 125 पहुंचता है। यह बिहार विधानसभा में बहुमत के आंकड़े 122 से तीन अधिक है। विधानसभा चुनाव जीतने के तुरंत बाद ही ओवैसी ने बिहार के विकास के नाम पर नीतीश कुमार का समर्थन करने की बात कही थी। अगर नीतीश कुमार अपनी मर्जी से राज्यसभा जाना चाहते हैं तो ठीक है, लेकिन यदि उन पर कोई सियासी मजबूरी है तो वह नया दांव भी खेल सकते हैं। राज्यसभा जाना है या नहीं, यह पूरी तरह से नीतीश कुमार पर ही निर्भर होगा।
क्यों आसान नहीं नीतीश को बदलना?
नीतीश कुमार के पास केंद्र के अलावा बिहार की सियासत का लंबा अनुभव हैं। वह 2005 से राज्य के मुख्यमंत्री हैं। वे गठबंधन राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं। स्थायी सामाजिक आधार भी है। जनता के बीच सुशासन वाली छवि उनको और मजबूत बनाती है। बिहार की महिलाओं और ईबीएस वोट बैंक में उनकी मजबतू पकड़ उन्हें हर सियासी संकट से निकलने की ताकत देती है। सबसे अहम यह है कि नीतीश कुमार सत्ता और विपक्ष दोनों के साथ काम करने का अनुभव रखते हैं। अगर पार्टी उनको केंद्र की सियासत में भेजती है तो उसे बिहार में अपना जनाधार खोना पड़ सकता है, क्योंकि नीतीश कुमार जैसी मजबूत पकड़ का नेता खोजना आसान नहीं होगा। केंद्र की सियासत में जाने के बाद उनका राज्य में दखल भी कम हो जाएगा।
कब और कहां-कहां चुनाव?
इसी साल 10 राज्यों की कुल 37 राज्यसभा सीटों पर चुनाव होने हैं। अप्रैल 2026 से इन सदस्यों के कार्यकाल समाप्त हो रहे हैं। 26 फरवरी को चुनाव की अधिसूचना जारी की गई। नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 5 मार्च है। 9 मार्च तक नामांकन वापस लिया जा सकता है। 16 मार्च को मतदान होगा। शाम 5 बजे से मतगणना होगी। महाराष्ट्र, ओडिशा, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना की 37 सीटों पर चुनाव होंगे।