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UP में जेडीयू से गठबंधन करने से क्यों बच रही बीजेपी? जानिए क्या है सियासी मजबूरी

यूपी मेें जेडीयू आगामी विधानसभा चुनाव में 25 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा कर रही है। जेडीयू एनडीए के साथ गंठबंधन करना चाहती है लेकिन बीजेपी सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) को साथ लेकर चुनाव में उतरेगी।

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प्रतीकात्मक फोटो Photo Credit Chat GPT

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बिहार में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की सबसे भरोसेमंद सहयोगी जनता दल (यूनाइटेड) उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में भी नेशनल डेमोक्रैटिक अलायंस (एनडीए) के साथ चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। पार्टी ने प्रदेश में संगठन को सक्रिय करते हुए करीब 25 सीटों पर अपनी तैयारी शुरू कर दी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब बिहार में बीजेपी और जेडीयू मिलकर सरकार चला रहे हैं, तो उत्तर प्रदेश में दोनों दलों के बीच चुनावी गठबंधन क्यों नहीं हो पाता? राजनीतिक जानकारों की मानें तो इसकी सबसे बड़ी वजह उत्तर प्रदेश की जातीय राजनीति, सहयोगी दलों का दबाव और बीजेपी की पहले से तैयार सामाजिक रणनीति है।

 

विधानसभा चुनाव 2022 से पहले भी जेडीयू ने बीजेपी के साथ गठबंधन की पूरी कोशिश की थी लेकिन सीट बंटवारे पर सहमति नहीं बन सकी। इसके बाद पार्टी ने 20 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ा लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी। अधिकांश उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए। यही वजह है कि इस बार जेडीयू अकेले चुनाव लड़ने के बजाय एनडीए के साथ चुनाव मैदान में उतरना चाहती है।

 

25 सीटों पर संगठन मजबूत करने में जुटी JDU

उत्तर प्रदेश प्रभारी और बिहार सरकार के ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार लगातार प्रदेश का दौरा कर रहे हैं। पार्टी सदस्यता अभियान चला रही है और पूर्वांचल व बिहार सीमा से लगे जिलों की करीब 25 सीटों पर संगठन मजबूत करने का दावा कर रही है। जेडीयू का कहना है कि उसकी पहली प्राथमिकता बीजेपी के साथ गठबंधन है।

 

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कुर्मी वोट बैंक बना सबसे बड़ा फैक्टर

उत्तर प्रदेश में कुर्मी मतदाताओं की संख्या करीब छह प्रतिशत मानी जाती है। पूर्वांचल, प्रयागराज और मध्य यूपी की कई विधानसभा सीटों पर यह वोट बैंक जीत-हार तय करने की स्थिति में रहता है। जेडीयू की राजनीति भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कुर्मी पहचान पर आधारित रही है। इसी कारण पार्टी उत्तर प्रदेश में भी इसी सामाजिक आधार पर अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रही है।

 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी पहले से अपना दल (एस) के साथ गठबंधन में है, जिसका मुख्य आधार भी कुर्मी समाज है। इसके अलावा बीजेपी ने प्रदेश संगठन में भी ओबीसी और कुर्मी नेतृत्व को मजबूत किया है। ऐसे में यदि जेडीयू को सीटें दी जाती हैं तो इसका सीधा असर पुराने सहयोगियों की हिस्सेदारी पर पड़ेगा। बीजेपी बिना स्पष्ट चुनावी लाभ के ऐसा जोखिम उठाने से बचना चाहती है।

पूर्वांचल पर जेडीयू की खास नजर

बिहार से सटी पूर्वांचल की करीब 38 विधानसभा सीटों को जेडीयू अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक संभावना मानती है। इन इलाकों में सामाजिक, भाषाई और पारिवारिक संबंध बिहार से जुड़े हैं। यही कारण है कि पार्टी का पूरा फोकस पूर्वांचल में संगठन विस्तार पर है और वह इसी क्षेत्र से अपनी चुनावी शुरुआत करना चाहती है।

 

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बीजेपी के लिए आसान नहीं सीट बंटवारा

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी पहले से कई सहयोगी दलों के साथ चुनावी तालमेल बनाए हुए है। यदि जेडीयू को शामिल किया जाता है तो सीटों का नया बंटवारा करना पड़ेगा, जिससे सहयोगी दलों में असंतोष पैदा हो सकता है। यही वजह है कि बीजेपी हर कदम राजनीतिक लाभ-हानि को ध्यान में रखकर उठा रही है।

 

बीजेपी नेताओं का कहना है कि उत्तर प्रदेश में गठबंधन और सीट बंटवारे का फैसला केंद्रीय नेतृत्व करेगा। यदि बीजेपी को लगता है कि जेडीयू को साथ लेने से चुनावी फायदा मिलेगा, तभी गठबंधन की तस्वीर साफ होगी। अन्यथा 2022 की तरह जेडीयू को फिर अकेले चुनावी मैदान में उतरना पड़ सकता है। फिलहाल 2027 के चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में एनडीए का विस्तार होगा या नहीं, इसका जवाब आने वाले महीनों में होने वाली राजनीतिक बातचीत से तय होगा।


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