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प्रधानमंत्री का बन रहा है मंदिर, व्यक्ति पूजा को लेकर क्या कहते हैं वेद? समझिए

कुछ दिनों पहले लोगों ने घोषणा की थी कि पटना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मंदिर बनाया जाएगा। इसी सिलसिले में सवाल उठता है कि व्यक्ति पूजन हिन्दू धर्म में वाजिब है या नहीं। जानें हिन्दू धर्म के वेद-पुराण क्या कहते हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit- Social Media

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भारत में कई लोग अलग-अलग धर्म और परंपराओं का पालन करते हैं। जहां एक तरफ कई धार्मिक परंपराएं मूर्ति पूजा को नकारती हैं, वहीं कई धर्मों में मूर्ति पूजा को स्वीकार किया गया है। इसी प्रकार हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा की परंपरा है। आज के दौर में कई लोग देवी-देवताओं के साथ-साथ अपने गुरुओं को भगवान की तरह मानते हैं। जब व्यक्ति किसी संन्यासी गुरु के विचारों को अपना लेते हैं, तो कई लोग उन्हीं गुरुओं की पूजा-अर्चना भी करते हैं। इसी तरह कई लोग व्यक्ति पूजन करने लगते हैं। इसी सिलसिले में हाल में कुछ लोगों ने घोषणा की थी कि वे प्रधानमंत्री मोदी का मंदिर बनाएंगे। ऐसे लोगों को जानना चाहिए कि व्यक्ति पूजन सही है या नहीं।

 

आज के दौर में लोग दूसरों के विचारों से इतने प्रभावित होते हैं कि व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को अपना गुरु समझ लेते हैं। सनातन धर्म में गुरु की आराधना करने की मान्यता दी गई है, हालांकि गुरुओं की भी भगवान के समान पूजा करने की मान्यता नहीं दी गई। इसी वजह से सवाल उठता है कि सनातन धर्म के वेद-पुराण में व्यक्ति पूजन को लेकर क्या कहा गया है? आइए इस सवाल का जवाब जानते हैं।

 

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व्यक्ति पूजन सही या गलत?

सनातन धर्म में भगवद्गीता ग्रंथ को बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। भगवद्गीता में साफ तौर पर बताया गया है कि भक्तों को व्यक्ति पूजा करनी चाहिए या नहीं। भगवद्गीता के अनुसार, व्यक्ति पूजा पूरी तरह वर्जित है। लोगों को अपने जीवन में दूसरे व्यक्ति की पूजा नहीं करनी चाहिए। इसी सिलसिले में भगवद्गीता में श्लोक बताया गया है।

 

भगवद्गीता में बताया गया है कि पूरे संसार में दो प्रकार के पुरुष हैं। पहले पुरुष वे हैं जो समय के साथ बदलते हैं और वक्त के बाद उनका निधन हो जाता है। दूसरे वे पुरुष हैं जो अपरिवर्तनशील हैं। इन दोनों से ऊपर पुरुषोत्तम हैं, जो समय बदलने के बाद भी कभी नहीं बदलते। यानी जिनका अंत नहीं है, वे अनंत हैं। यही पुरुषोत्तम पुरुष पूजन के असली हकदार हैं।

 

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द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते।।

 

इस श्लोक का मतलब है कि पुरुष दो प्रकार के हैं। एक वह हैं जो समय के साथ बदल जाते हैं, दूसरे पुरुष वे हैं जो वक्त के साथ नहीं बदलते। इन दोनों के परे परमात्मा हैं, जो अनंत हैं।

व्यक्ति पूजा है गलत?

इस श्लोक से साफ होता है कि व्यक्ति चाहे संत हो, राजा हो या महान व्यक्ति हो, वह हमेशा पहली श्रेणी के पुरुष कहलाएगा। उनका सम्मान करना वाजिब है, हालांकि धर्म ग्रंथ के हिसाब से व्यक्ति पूजा अमान्य है। इसलिए लोगों को व्यक्ति पूजा से बचना चाहिए।

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