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अक्षय तृतीया से है जगन्नाथ रथ यात्रा का विशेष संबंध, जानें सब कुछ

अक्षय तृतीया के दिन जगन्नाथ पुरी खास तैयारियां शुरू हो जाती हैं, जिसका भगवान जगन्नाथ के रथ यात्रा से जुड़ी होती है। आइए जानते हैं क्या है इस दिन का महत्व।

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जगन्नाथ रथ यात्रा।(Photo Credit: Wikimedia Commons)

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अक्षय तृतीया हिंदू धर्म में अत्यंत पावन तिथि मानी जाती है। इसे 'अबूझ मुहूर्त' भी कहा जाता है, यानी इस दिन कोई भी शुभ कार्य बिना पंचांग देखे किया जा सकता है। अक्षय तृतीया का सीधा संबंध जगन्नाथ रथ यात्रा की तैयारी से भी है। ओडिशा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ के भव्य रथों के निर्माण की शुरुआत अक्षय तृतीया से ही होती है।

अक्षय तृतीया और जगन्नाथ रथ यात्रा का संबंध

अक्षय तृतीया के दिन से लकड़ी काटने और रथ बनाने का कार्य विधिपूर्वक प्रारंभ होता है। यह कार्य विशेष नियमों और परंपराओं के अनुसार होता है, जिसमें चुनिंदा लकड़ियां और पारंपरिक औजारों का ही उपयोग किया जाता है। रथ निर्माण कार्य को 'रथानुका निर्माण' कहा जाता है। इस तरह, अक्षय तृतीया और जगन्नाथ रथ यात्रा के बीच एक पवित्र और सांस्कृतिक संबंध स्थापित है।

 

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रथ यात्रा 2025 में कब होगी?

जगन्नाथ रथ यात्रा 2025 में 29 जून को निकाली जाएगी। यह यात्रा हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को आयोजित होती है। इस दिन भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपनी विशाल रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण करते हैं और गुंडिचा मंदिर तक जाते हैं। हजारों भक्त इस यात्रा में भाग लेते हैं और भगवान के रथ को खींचने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं, जिसे बहुत पुण्यदायक माना जाता है।

रथ यात्रा से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं

रथ यात्रा से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक प्रमुख कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारका छोड़ने के बाद जब कुरुक्षेत्र की यात्रा की थी, तो वहां उनके परिवार के सदस्य, विशेष रूप से बहन सुभद्रा, उन्हें देखने आई थीं। पुरी में आयोजित रथ यात्रा उसी भाव को दर्शाती है जब भाई-बहन एक साथ बाहर यात्रा पर जाते हैं।

 

एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान जगन्नाथ वर्ष में एक बार अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए मंदिर से बाहर आते हैं। गुंडिचा मंदिर को भगवान की मौसी का घर माना जाता है, और यह यात्रा मौसी के घर जाने के प्रतीक के रूप में देखी जाती है।

 

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रथ यात्रा का आयोजन बहुत भव्य तरीके से किया जाता है। भगवान जगन्नाथ के लिए 'नंदीघोष' नामक रथ, बलभद्र के लिए 'तालध्वज' और सुभद्रा के लिए 'दर्पदलन' नामक रथ बनाया जाता है। हर रथ का निर्माण विशेष मापदंडों, परंपराओं और शास्त्रों के अनुसार किया जाता है।

 

कहा जाता है कि इस दिन भगवान के रथ को स्पर्श करने मात्र से व्यक्ति के पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पुरी में इस अद्भुत आयोजन में भाग लेने आते हैं।

 

Disclaimer- यहां दी गई सभी जानकारी सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं।

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