मुस्लिम धर्म में मोहर्रम का महीना बेहद खास माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह महीना त्याग और बलिदान का प्रतीक है। इसी महीने में मोहम्मद पैगंबर के पोते इमाम हुसैन कर्बला के युद्ध में शहीद हुए थे, जिनकी याद में कई लोग मातम और शोक मनाते हैं। साथ ही इमाम हुसैन के बलिदान को याद करते हैं। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार 17 जून से मोहर्रम का पाक महीना शुरू हो चुका है। इस साल लगभग 26 या 27 जून को आशूरा मनाया जाएगा। माना जाता है कि आशूरा के दिन ही इमाम हुसैन शहीद हुए थे।
धार्मिक मान्यता के मुताबिक, मोहर्रम महीने के शुरुआती 10 दिनों तक लोगों को अल्लाह की इबादत करनी चाहिए। माना जाता है कि इस महीने नमाज पढ़ने से अल्लाह लोगों की गलतियों को माफ करते हैं। अब सवाल उठता है कि कर्बला का युद्ध क्यों हुआ था। साथ ही यह भी सवाल है कि युद्ध में किन परिस्थितियों में इमाम हुसैन शहीद हुए थे, जिसका शोक आज भी लोग मनाते हैं। आइए कर्बला के युद्ध की कहानी जानते हैं।
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किस वजह से हुआ कर्बला का युद्ध?
कर्बला का युद्ध इमाम हुसैन के जमीर की वजह से हुआ था, उन्होंने एक क्रूर खलीफा के सामने झुकने से इनकार कर दिया था। इमाम हुसैन लोगों की रक्षा और अन्याय को खत्म करने के युद्ध के मैदान में आए थे। हालांकि, कर्बला के युद्ध में जो हुआ, उस दिन को याद करके आज भी लोगों की आंखें भर जाती हैं।
अन्याय के खात्मे के लिए शुरू हुआ युद्ध
आज से लगभग 1346 साल पहले इस्लाम में कोई भी व्यक्ति सबकी सहमति के बाद खलीफा बनता था जबकि मुआविया नाम के शासक ने इस परंपरा को अपने षड्यंत्र से बदल दिया और अपने बेटे यजीद को नया खलीफा बना दिया। यजीद के विचार और व्यवहार बिल्कुल अलग थे। वह धर्म की सीख और शिक्षाओं पर नहीं चलता था। वह लोगों के साथ अच्छा व्यवहार भी नहीं करता था, साथ ही लोगों को डरा-धमकाकर अपनी बात मनवाता था।
खलीफा बनने के बाद यजीद सही और गलत में फर्क करना भूल गया था। वह अपने आसपास के लोगों को गुलाम समझता था। वह अपनी ताकत के बल पर इमाम हुसैन से अपने नियम-कानून मानने के लिए दबाव बनाना चाहता था, जबकि इमाम हुसैन ने बहादुरी दिखाई और यजीद के नियम मानने से इनकार कर दिया। जिसके बाद इमाम इराक छोड़कर दूसरे स्थान पर रहने चले गए।
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इमाम को दिया गया धोखा
जब इमाम हुसैन दूसरे शहर जा चुके थे, तब उन्हें इराक के कूफा शहर से कुछ लोगों ने पत्र भेजा। पत्र के जरिए कूफा के लोगों ने यजीद के अत्याचार से बचाने के लिए उन्हें बुलाया था। इसके बाद इमाम अपने 72 साथियों के साथ इराक के कूफा शहर की ओर जा रहे थे। तभी कर्बला में यजीद की फौज ने इमाम के परिवार और मासूम बच्चों के लिए फरात नदी का पानी बंद कर दिया। जिस वजह से कर्बला के रेगिस्तान में लोग प्यास से तड़पने लगे। इसके बाद इमाम हुसैन के 72 साथियों ने यजीद की विशाल सेना के सामने युद्ध लड़ा। इस युद्ध के 10वें दिन इमाम हुसैन समेत 72 लोग शहीद हो गए।
नोट- यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं के आधार पर दी गई है। इसकी पुष्टि हम नहीं करते हैं।