अक्सर कई लोग कहते हैं कि व्यक्ति की इच्छाओं का कुआं ऐसा होता है, जो कभी नहीं भरता। अर्थात इच्छाएं कभी पूरी नहीं होतीं। सनातन धर्म में भी माना गया है कि व्यक्ति को अपनी इच्छाओं पर काबू पाना चाहिए। इच्छाएं अनंत होती हैं। जब व्यक्ति की एक इच्छा पूरी होती है, तो वह दूसरी इच्छा की कामना करने लगता है। इसी विषय पर श्रीमद्भागवत महापुराण में राजा ययाति की कहानी लिखी गई है, जो यह साबित करती है कि इच्छा कभी खत्म नहीं होती।
श्रीमद्भागवत महापुराण के स्कंध 9 में राजा ययाति की कथा का वर्णन मिलता है। इस कथा में बताया गया है कि भौतिक सुखों के मोह में पड़ने के कारण राजा ययाति को शुक्राचार्य से श्राप मिला था। श्राप मिलने के बाद भी राजा ययाति यह नहीं समझ पाए कि उन्हें अपनी इच्छाओं पर काबू पाना चाहिए। भौतिक सुखों के लालच में उन्होंने अपने बेटे की जवानी तक ले ली थी।
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शुक्राचार्य ने क्यों दिया श्राप?
राजा ययाति नहुष के छह पुत्रों में से एक थे। वे बेहद शक्तिशाली और पराक्रमी राजा थे। शुक्राचार्य ने अपनी पुत्री देवयानी का विवाह ययाति से कराया था। विवाह के बाद देवयानी के साथ उनकी दासी शर्मिष्ठा भी आई थी। शर्मिष्ठा के सुंदर रूप को देखकर ययाति उस पर मोहित हो गए।
इसके बाद अवसर मिलते ही ययाति ने शर्मिष्ठा के साथ प्रेम संबंध बना लिए। जब यह बात देवयानी को पता चली, तो वह बेहद दुखी होकर अपने पिता शुक्राचार्य के घर चली गई। जब शुक्राचार्य को ययाति के इस आचरण के बारे में पता चला, तो वे क्रोधित हो गए। उन्होंने ययाति को श्राप दिया कि वे जवानी में ही बूढ़े हो जाएंगे। तब ययाति ने कहा कि यदि उन्हें समय से पहले वृद्धावस्था आ गई, तो इससे आपकी पुत्री को भी दुख होगा। इस पर शुक्राचार्य ने कहा कि यदि कोई दूसरा व्यक्ति अपनी जवानी तुम्हें दे दे, तो तुम फिर से युवा हो सकते हो।
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भोग की इच्छा में बेटे की छीनी जवानी
ययाति ने अपनी जवानी बनाए रखने के लिए अपने पुत्र पुरु से उसकी जवानी ले ली। जवानी मिलने के बाद ययाति कई वर्षों तक भोग-विलास में लिप्त रहे, लेकिन उन्हें कभी संतुष्टि नहीं मिली। उनकी इच्छाएं लगातार बढ़ती ही रहीं।
हालांकि, कई वर्षों बाद ययाति ने अपनी जवानी अपने पुत्र को वापस लौटा दी और इच्छाओं पर नियंत्रण रखते हुए वैराग्य का मार्ग अपना लिया। इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है कि व्यक्ति की इच्छाएं अनंत होती हैं। वे पूरी होने के बाद भी समाप्त नहीं होतीं। सच्ची शांति भोग से नहीं, बल्कि इच्छाओं पर नियंत्रण और वैराग्य से मिलती है।
नोट- यह लेख धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं पर आधारित है। इसकी पुष्टि नहीं करता है।