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ईसाई धर्म के 7 घोर पाप, जो व्यक्ति के चरित्र और जीवन को कर सकते हैं बर्बाद

बाइबल के अनुसार, व्यक्ति को 7 तरह के ऐसे कर्मों और भावनाओं से बचना चाहिए, जिन्हें ईसाई धर्म में घोर पाप माना जाता है। इन भावनाओं के प्रभाव में आकर लोग ईसा मसीह के बताए मार्ग से दूर हो सकते हैं। 

people reading the bible

प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit- Gemini

ईसाई धर्म में पाप और पुण्य की विशेष मान्यता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लोगों को अपने जीवन में 7 तरह की भावनाओं पर काबू पाना चाहिए। तभी व्यक्ति का जीवन सफल हो सकता है, वरना ये भावनाएं उसके जीवन को बर्बाद कर सकती हैं। बाइबल में साफ तौर पर बताया गया है कि वासना, लोभ, लालच, आलस, ईर्ष्या, अभिमान और क्रोध जैसी भावनाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए। जो व्यक्ति इन भावनाओं के प्रभावित रहता है, उसे घोर पापी माना जाता है। साथ ही यह भी माना जाता है कि जो व्यक्ति इन भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाता, उसके लिए यही भावनाएं सबसे बड़ी दुश्मन बन जाती हैं, जो उसके पतन का कारण बन सकती हैं।


ईसाई धर्म में पापों को दो भागों में बांटा गया है। पहला साधारण पाप और दूसरा घातक पाप। घातक पाप इसलिए अधिक खतरनाक माने जाते हैं क्योंकि इन्हें अन्य पापों की जड़ माना जाता है। यानी कि क्रोध, ईर्ष्या, लालच और वासना जैसी भावनाएं व्यक्ति को अन्य गलत कर्मों की ओर प्रेरित कर सकती हैं। इस वजह से इन भावनाओं को घातक पाप माना गया हैं। आइए जानते हैं कि ये सात घातक पाप व्यक्ति को किस प्रकार नुकसान पहुंचाते हैं।

 

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घातक पाप कैसे इंसान को बर्बाद करता हैं?


ईसाई धर्म के अनुसार अहंकार, ईर्ष्या, लालच, क्रोध, लोभ, वासना और आलस व्यक्ति के सबसे घातक शत्रु हैं। आइए एक-एक करके इनके बारे में जानते हैं, साथ ही यह भी जान लेते है कि इन भावनाओं से कैसे इंसान का पतन हो सकता है।


1 अहंकार


बाइबल के अनुसार, अहंकार सभी पापों में सबसे घातक माना गया है। अहंकार का अर्थ है स्वयं को सबसे श्रेष्ठ समझना और अपनी कमियों को न देखना। जब व्यक्ति अपने अहंकार पर नियंत्रण नहीं रख पाता, तब वह ईश्वर की कृपा को भूल जाता है। बाइबल के अनुसार यह सबसे बड़ा पाप इसलिए माना गया है क्योंकि अहंकारी व्यक्ति अपनी गलती स्वीकार नहीं करता। परिणामस्वरूप वह अपने पापों का पश्चाताप भी नहीं कर पाता और मुक्ति के मार्ग से दूर हो जाता है।


2 लालच


बाइबल में बताया गया है कि व्यक्ति को हमेशा संतुष्ट रहना चाहिए और जो कुछ उसके पास है, उसके लिए ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए। हालांकि आज के समय में लोग दूसरों की संपत्ति और धन देखकर लालच करने लगते हैं। इसे पाप माना गया है क्योंकि लालच व्यक्ति को दूसरों का हक छीनने के लिए प्रेरित कर सकता है। धन का लालच कई बुराइयों की जड़ माना जाता है। लालच के कारण व्यक्ति सही और गलत का अंतर भी भूल सकता है।

 

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3. काम वासना


वासना का अर्थ केवल शारीरिक संबंध नहीं है, बल्कि मन की वह इच्छा भी है, जिसमें व्यक्ति दूसरों को इंसान के बजाय एक वस्तु के रूप में देखने लगता है। वासना के प्रभाव में व्यक्ति दूसरों की भावनाओं और सम्मान को समझ नहीं पाता। यही भावना कई बार गंभीर पापों और गलत कार्यों का कारण बन जाती है।


4. क्रोध


बाइबल में बताया गया है कि व्यक्ति को अपने क्रोध पर नियंत्रण रखना चाहिए। क्रोध कई समस्याओं को सुलझाने के बजाय और अधिक बढ़ा देता है। ज्यादा क्रोध व्यक्ति को दूसरों को नुकसान पहुंचाने के लिए प्रेरित कर सकता है। इसी कारण इसे घातक पापों की श्रेणी में रखा गया है। क्रोध व्यक्ति की विवेक शक्ति को भी नष्ट कर सकता है।


5 पेटूपन


अधिक खाने की आदत को अक्सर लोग छोटा पाप समझते हैं, जबकि ईसाई धर्म में इसे भी घोर पाप माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ईश्वर चाहते हैं कि इंसान अपने शरीर का ध्यान रखे और उतना ही भोजन करे जितनी उसे आवश्यकता हो। जरूरत से ज्यादा भोजन करना भोजन के प्रति लालच को बढ़ाता है। बहुत जल्दी-जल्दी खाना या आवश्यकता से अधिक भोजन करना भोजन की बर्बादी का कारण भी बन सकता है। यह पाप इसलिए खतरनाक माना जाता है क्योंकि यह धीरे-धीरे व्यक्ति को ईश्वर से दूर कर देता है और उसे अपनी इच्छाओं का दास बना देता है।

 

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6 ईर्ष्या


ईर्ष्या के कारण व्यक्ति को दूसरों की खुशी और सफलता देखकर जलन होती है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपनी खुशियों की बजाय दूसरों की उपलब्धियों पर ध्यान देने लगता है। धीरे-धीरे वह दूसरों की खुशी छीनने की इच्छा रखने लगता है। यही सोच कई बार उसे गलत रास्ते और पाप की ओर ले जाती है।


7 आलस


आलस्य के कारण व्यक्ति अपने लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पाता, जिससे उसका जीवन निरर्थक लगने लगता है। जिस व्यक्ति के जीवन में उद्देश्य नहीं होता, वह अपने गुणों और कौशल का सही उपयोग नहीं कर पाता। ईसाई धर्म के अनुसार कर्म करना मनुष्य का कर्तव्य है, जबकि अपने कर्तव्यों को न करना घोर पाप माना गया है। आलस व्यक्ति की प्रगति और  विकास दोनों में बाधा बन सकता है।

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