हम सब जानते हैं कि जन्म और मृत्यु परम सत्य हैं। कोई भी इसे टाल नहीं सकता। व्यक्ति के जीवन में मृत्यु एक ऐसी घटना है, जिसका सामना हर किसी को करना पड़ता है। इस घटना को न कोई रोक सकता है और न ही टाल सकता है। मृत्यु के बाद व्यक्ति को अपने जीवन की सभी मोह-माया छोड़कर जाना पड़ता है। इंसान अपने जीवन की कीमती से कीमती चीज भी मृत्यु के बाद साथ नहीं ले जा सकता। इसी बारे में हिंदू धर्म के लोकप्रिय ग्रंथ गरुड़ पुराण में लिखा गया है। गरुड़ पुराण के मुताबिक, उसी व्यक्ति को जीवन-मुक्ति मिलती है जो मृत्यु के बाद मोह-माया का त्याग करता है। जिसका सटिक उदाहरण त्रिशंकु की पौराणिक कहानी है।
सनातन धर्म में गरुड़ पुराण बेहद लोकप्रिय ग्रंथ है, जिसमें मुख्य तौर पर इंसान की जीवन और मृत्यु की यात्रा के बारे में बताया गया है। इस ग्रंथ में खास तौर पर मृत्यु और मृत्यु के बाद होने वाली परंपराओं का वर्णन किया गया है। इसी बात को आप राजा त्रिशंकु की पौराणिक कहानी के जरिए समझ सकते हैं। आइए जानते हैं कि राजा त्रिशंकु की पौराणिक कथा क्या है।
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क्या है राजा त्रिशंकु की कहानी?
पौराणिक कथा के मुताबिक, राजा त्रिशंकु इक्ष्वाकु वंश के राजा थे, जिन्होंने अपने जीवन में कई अच्छे कर्म किए थे। उनकी मृत्यु को लेकर एक ही ख्वाहिश थी कि उन्हें मृत्यु के बाद भी अपने शरीर का त्याग न करना पड़े। जब उनका निधन हुआ, तो उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा जाहिर करते हुए कहा था कि वह अपना शरीर त्यागना नहीं चाहते। वह स्वर्ग लोक में भी अपने इंसानी शरीर के साथ जाना चाहते थे।
राजा अपनी इच्छा लेकर गुरु वशिष्ठ के पास गए थे, जहां उन्होंने प्रार्थना की थी कि उन्हें शरीर सहित स्वर्ग जाने का आशीर्वाद मिले। गुरु वशिष्ठ ने त्रिशंकु की प्रार्थना स्वीकार नहीं की क्योंकि यह प्रकृति के नियमों के खिलाफ थी। इसके बाद त्रिशंकु वशिष्ठ के पुत्रों के पास गए। गुरु-पुत्रों ने जब यह देखा कि राजा त्रिशंकु उनके पिता की बात न मानकर मोह के बंधन में बंधे हुए हैं, तो उन्हें क्रोध आ गया। गुरु-पुत्रों ने श्राप दिया कि राजा त्रिशंकु का रूप चांडाल में बदल जाए। साथ ही उन्हें धन-दौलत से वंचित होकर दर-दर भटकना पड़े। इसके बाद त्रिशंकु राजा विश्वामित्र के पास गए।
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विश्वामित्र ने दिया स्वर्ग भेजने का वचन
जब त्रिशंकु विश्वामित्र के पास गए, तो विश्वामित्र ने उन्हें वचन दिया कि वह उन्हें शरीर सहित स्वर्ग लोक भेजेंगे। वादे के मुताबिक, जैसे ही त्रिशंकु स्वर्ग लोक पहुंचे, वहां हड़कंप मच गया। राजा त्रिशंकु स्वर्ग से नीचे गिर गए, यानी वह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच लटककर रह गए। इसके बाद वह कभी स्वर्ग लोक नहीं जा पाए। हालांकि बाद में विश्वामित्र ने त्रिशंकु के लिए एक अलग लोक का निर्माण किया, जहां मृत्यु के बाद त्रिशंकु रहे थे।
इस कहानी से यह संदेश मिलता है कि मोह-माया से मुक्ति के बिना इंसान को न तो स्वर्ग की प्राप्ति होती है और न ही मोक्ष मिलता है।