भगवान शिव को 'देवों के देव' कहा जाता है क्योंकि वे किसी विशेष ढांचे में नहीं बंधे हैं। उनकी पूजा केवल एक देवता के रूप में नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की उस चेतना के रूप में की जाती है जो सृजन और विनाश दोनों का संतुलन बनाए रखती है। उनके नाम केवल पुकारने के लिए नहीं हैं बल्कि वे उनके विशिष्ट गुणों और भक्तों के प्रति उनके प्रेम की व्याख्या करते हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शिव का व्यक्तित्व 'अद्वैत' है, जहां सुंदरता और भयानकता का मिलन होता है। वे श्मशान में भी वास करते हैं और कैलाश के शिखर पर भी। यही कारण है कि समाज के हर वर्ग चाहे वह राजा हो या रंक, देवता हों या असुर सभी के लिए शिव सुलभ और प्रिय रहे हैं।
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प्रमुख नाम और मतलब
अघोरी
'अघोरी' का अर्थ है जो 'घोर' यानी भयानक न हो। शिव को अघोरी इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह घृणा और मोह से मुक्त हैं। वह श्मशान की राख मलते हैं और जीवन-मृत्यु के चक्र को समान दृष्टि से देखते हैं। यह नाम उनके उस रूप को दर्शाता है जो समाज के बनाए 'सुंदर-असुंदर' के भेदों को नहीं मानता।
मनमाना
शिव को 'मनमाना' उनके स्वतंत्र स्वभाव के कारण कहा जाता है। वह किसी नियम, रीति-रिवाज या सामाजिक दबाव में नहीं बंधे हैं। वह अपनी इच्छा से विष पी लेते हैं और अपनी इच्छा से तांडव करते हैं। यह नाम उनकी उस संप्रभुता का प्रतीक है जहां वे स्वयं ही नियम हैं।
भोला और भोलेनाथ
शिव को 'भोला' इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे छल-कपट से कोसों दूर हैं। वह बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, उन्होंने भस्मासुर जैसे राक्षसों को भी उनकी भक्ति देख कर वरदान दे दिया था, बिना यह सोचे कि इसका परिणाम क्या होगा। वे अपने भक्तों की चतुराई नहीं बल्कि भाव देखते हैं।
शंकर
'शंकर' शब्द 'शं' और 'कर' से मिलकर बना है। 'शं' का अर्थ है कल्याण और 'कर' का अर्थ है करने वाला। यानी वह जो सबका मंगल करे। शिव का यह रूप सृष्टि में सामंजस्य स्थापित करता है और अज्ञानता का नाश कर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है।
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नीलकंठ
समुद्र मंथन के दौरान निकला विष नकारात्मकता और बुराई का प्रतीक था। उन्होंने यह विष न तो उगला (ताकि बाहर विनाश न हो) और न ही निगला (ताकि उनके भीतर का ब्रह्मांड सुरक्षित रहे)। यह कथा दिखाती है कि शिव और शक्ति के सहयोग से ही सबसे कठिन विष को भी नियंत्रित किया जा सकता है।
महाकाल
'काल' का अर्थ समय भी है और मृत्यु भी। शिव इन दोनों के नियंत्रक हैं। उज्जैन के महाकाल मंदिर में भस्म आरती इस बात का प्रतीक है कि अंततः सब कुछ राख (भस्म) हो जाना है, केवल शिव ही शाश्वत हैं। महाकाल अपने भक्तों को अकाल मृत्यु के भय से मुक्त करते हैं।
नोट: इस खबर में लिखी गई बातें धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।