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जया एकादशी क्यों मनाई जाती है? जानें व्रत के नियम

जया एकादशी माघ मास के शुक्ल पक्ष की वह तिथि है जो मनुष्य को नीच योनियों जैसे पिशाच से मुक्ति दिलाने और मानसिक पापों के नाश के लिए मनाई जाती है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, AI Sora

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हिंदू धर्म में जया एकादशी की बहुत मान्यता है। यह मुख्य रूप से माघ महीने के शुक्ल पक्ष में पड़ती है। ऐसी मान्यता है कि जो इस दिन इस दिन पूरी श्रद्धा से भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, उन्हें अनजाने में हुए पापों से मुक्ति मिलती है। इस एकादशी को मनाने के पीछे की मुख्य धारणा "मुक्ति" है। विशेष रूप से इसे 'पिशाच योनि' या नकारात्मक मानसिक अवस्थाओं से छुटकारा पाने वाला माना गया है। जया एकादशी 29 जनवरी को मनाई जाएगी। 

 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यदि कोई अपनी गलतियों के कारण पतन की ओर जा रहा हो, तो जया एकादशी का व्रत उसे आत्मिक शांति प्रदान करता है। यही कारण है कि इसे केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं बल्कि खुद को मानसिक और आध्यात्मिक रूप से बेहतर बनाने का एक अवसर माना जाता है।

 

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क्यों मनाया जाता है?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पद्म पुराण में वर्णित इंद्र की सभा में गंधर्व और पुष्पवती नाम की अप्सरा रहती थी। दोनों से कुछ गलतियां होने के कारण इंद्र ने क्रोध में आकर उन्हें स्वर्ग से बाहर कर दिया और पिशाच योनि में जाने का श्राप दे दिया।

 

दोनों इसके बाद हिमालय में रहने लगे। संयोगवश माघ शुक्ल एकादशी के दिन उन्होंने अत्यधिक ठंड और दु:ख के कारण केवल फल-फूल खाए और रात भर सो नहीं सके। अनजाने में उनसे 'जया एकादशी' का व्रत पूर्ण हो गया। इस व्रत के पुण्य से वे पिशाच योनि से मुक्त होकर पुनः अपने दिव्य स्वरूप में लौट आए। तभी से इस व्रत को कष्टों से मुक्ति के लिए मनाया जाता है।

जया एकादशी का महत्व

  • ऐसी मान्यता है कि अगर आपको अपने पापों का प्रायश्चित करना है तो इस व्रत को करना चाहिए। इसे पापमोचनी के समान माना गया है।
  • यह व्रत बुरे विचारों और मानसिक विकारों को दूर करने में सहायक माना जाता है।
  • कई लोग अपने पूर्वजों की शांति के लिए भी यह व्रत रखते हैं।

व्रत और पूजा विधि

  • सुबह स्नान के बाद भगवान विष्णु के सामने दीप जलाकर व्रत का संकल्प लें।
  • भगवान विष्णु के 'श्रीधर' स्वरूप की पूजा की जाती है। उन्हें पीले फूल, धूप, दीप और पंचामृत अर्पित करें।
  • भगवान को तुलसी के पत्ते जरूर चढ़ाएं, क्योंकि तुलसी के बिना विष्णु जी की पूजा अधूरी मानी जाती है।
  • एकादशी की रात में सोना नहीं चाहिए बल्कि कीर्तन या मंत्र जाप करना चाहिए।
  • अगले दिन यानी द्वादशी को किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराने के बाद ही व्रत खोलें।

क्या करें और क्या न करें?

  • एकादशी के दिन चावल का सेवन पूरी तरह वर्जित है क्योंकि माना जाता है कि इस दिन चावल में पानी का मात्रा अधिक होने के कारण मन चंचल होता है।
  • इस दिन लहसुन, प्याज और तामसिक भोजन से दूर रहना चाहिए।


नोट: इस खबर में लिखी गई बातें धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।

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