हिन्दू धर्म में कई पर्व-त्योहार मनाए जाते हैं। इन्हीं पर्वों में से गुरु पूर्णिमा का पर्व बेहद खास माना जाता है। इस पर्व पर कई भक्त व्रत रखते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, गुरु पूर्णिमा के दिन न सिर्फ देवी-देवताओं की पूजा करनी चाहिए, बल्कि गुरुओं की भी आराधना करनी चाहिए। जुलाई महीने में मनाया जाने वाला गुरु पूर्णिमा पर्व वेद व्यास जयंती के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि इसी दिन महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था। इस पर्व पर भक्तों को न सिर्फ व्रत रखना चाहिए, बल्कि गुरु पूर्णिमा की कथा भी सुननी चाहिए।
गुरु वेद व्यास ने पुराणों और महाभारत ग्रंथ की रचना की थी। इन ग्रंथों के जरिए लोगों को सही तरीके से जीवन जीने की सीख मिलती है। गुरु पूर्णिमा के दिन लोगों को वेद व्यास जी की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। यह पर्व जुलाई महीने में मनाया जाएगा। अब सवाल उठता है कि गुरु पूर्णिमा की सही तारीख क्या है। साथ ही यह भी जानना जरूरी है कि गुरु पूर्णिमा के दिन भक्तों को कौन-कौन से शुभ कार्य करने चाहिए।
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गुरु पूर्णिमा की सही तारीख
हिन्दू पंचांग के मुताबिक, 28 जुलाई की शाम 6 बजकर 22 मिनट से गुरु पूर्णिमा तिथि शुरू हो रही है। इसके बाद 29 जुलाई की रात 8 बजकर 8 मिनट पर यह तिथि समाप्त होगी। इसी वजह से गुरु पूर्णिमा 29 जुलाई को मनाई जाएगी।
29 जुलाई को ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:17 बजे से 4:59 बजे तक रहेगा। वहीं विजय मुहूर्त दोपहर 2:43 बजे से 3:37 बजे तक रहेगा। इसके अलावा संध्या काल शाम 7:14 बजे से शुरू होकर 8:17 बजे तक रहेगा।
गुरु पूर्णिमा के दिन क्या करें?
1.गुरु पूर्णिमा के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। उसके बाद संकल्प लेकर व्रत रखें।
2.सुबह देवी-देवताओं और अपने गुरु की पूजा-पाठ करें। साथ ही व्रत कथा पढ़ें और सुनें।
3.इस दिन जरूरतमंद लोगों को अनाज, कपड़े और धन का दान करें।
4.शाम के समय गुरु की पूजा करें। इसके बाद चंद्र देव को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें।
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गुरु पूर्णिमा व्रत कथा
पौराणिक कथा के मुताबिक, एक दिन महर्षि पराशर भ्रमण के लिए निकले थे। वहां उनकी मुलाकात एक महिला से हुई, जिसका नाम सत्यवती था। सत्यवती बेहद खूबसूरत थीं और एक मछुआरे की बेटी थीं। इस वजह से उनके शरीर से हमेशा मछली की गंध आती थी। जब सत्यवती की मुलाकात महर्षि पराशर से हुई, तब उन्होंने इच्छा जाहिर की कि वह ऋषि से एक संतान चाहती हैं।
यह सुनकर ऋषि पहले हैरान हो गए। उन्होंने बताया कि अनैतिक संबंध बनाकर संतान को जन्म देना उचित नहीं होगा। इसके साथ ही उन्होंने वरदान देते हुए कहा कि तुम्हारी कोख से जो संतान जन्म लेगी, वह महान ज्ञानी होगी। तब सत्यवती ने शर्त रखी कि होने वाला पुत्र महान विद्वान हो और उसके शरीर से फूलों जैसी सुगंध आए। इसके बाद सत्यवती की कोख से एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम द्वैपायन रखा गया। आगे चलकर वही महर्षि वेदव्यास के नाम से प्रसिद्ध हुए।
नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और गणनाओं पर आधारित है। इसकी पुष्टि हम नहीं करते हैं।