गुजरात के अहमदाबाद स्थित लालभाई दलपतभाई म्यूजियम में हाल ही में एक प्रदर्शनी लगी थी, जहां चीनी मिट्टी से बनी कृष्ण और शिव भगवान की मूर्तियां रखी गई थीं। ये मूर्तियां बाकी मूर्तियों की तुलना में बेहद अलग हैं। इनमें कृष्ण भगवान का चेहरा बेहद नाजुक है और उनके चेहरे पर गुलाबी रंग की झलक के साथ यूरोपीय अंदाज का मुकुट दिखाई देता है तो कई मूर्तियों में कृष्ण भगवान गोद में गाय लिए दिखे।
मूर्ति में कृष्ण भगवान बिल्कुल यूरोपीय अंदाज में नजर आ रहे हैं। इसके अलावा प्रदर्शनी में जापानी चेहरे जैसी दिखने वाली शिव भगवान की मूर्ति भी प्रदर्शित की गई। इन मूर्तियों का रहस्य भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में छिपा हुआ है।
लालभाई दलपतभाई म्यूजियम में अनिल राय ने चीनी मिट्टी से बनी भगवान की मूर्तियों की प्रदर्शनी दिखाई थी। अनिल राय 1990 के दशक में सूरत की एक एंटीक सामान की दुकान पर गए थे। वहां उन्हें जापानी चेहरे वाले शिव भगवान और यूरोपीय अंदाज में दिखने वाले कृष्ण भगवान की मूर्तियां दिखाई दी थीं। उन्होंने इन मूर्तियों को खरीद लिया, जिसके बाद वे इनके इतिहास के बारे में जानने में जुट गए।
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अनोखी मूर्तियों का रहस्य क्या है?
अनिल राय के मुताबिक, चीनी मिट्टी से बनी देवी-देवताओं की मूर्तियों का इतिहास उपनिवेशिक काल से जुड़ा है। जब 19वीं सदी के आखिर में भारत में प्रिंटिंग प्रेस का प्रचलन बढ़ता जा रहा था, तब तस्वीरों की छपाई होने लगी थी। इसी समय कलकत्ता के चोरबागान आर्ट स्टूडियो समेत पुणे के चित्रशाला प्रेस में देवी-देवताओं की रंगीन तस्वीरें छपती थीं, जिन्हें कई लोग खरीदते थे।
उस दौर के चित्रकार राजा रवि वर्मा ने अपनी चित्रकला के जरिए देवी-देवताओं की तस्वीरें लोगों के घर-घर तक पहुंचाईं। उनके इस कदम की वजह से देवी-देवताओं की तस्वीरें सिर्फ अमीर लोगों के घरों तक ही सीमित नहीं रहीं, बल्कि आम लोगों के घरों तक भी पहुंच पाईं। हालांकि, उस दौर में भी कांसे और लकड़ी से बनी मूर्तियां बेहद महंगी होती थीं, जिन्हें हर व्यक्ति खरीद नहीं सकता था।
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जर्मनी और जापान में बनाई गईं मूर्तियां
19वीं सदी में बड़ी संख्या में लोग देवी-देवताओं की तस्वीरें देखते थे। इसे देखकर यूरोपीय व्यापारियों ने सोचा कि कम दाम में मूर्तियां बनाई जाएं, जिन्हें भारतीय लोगों को बेचा जा सके। यूरोपीय व्यापारियों को भारतीय व्यापारियों ने देवी-देवताओं की तस्वीरों के प्रिंट भेजे। उन्हीं तस्वीरों को देखकर जर्मनी, ऑस्ट्रिया और जापान के कारीगरों ने मूर्तियां बनाईं। हालांकि, उन लोगों ने न तो कभी देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाई थीं और न ही कभी भारतीय लोगों को देखा था।
विदेशी मूर्तिकारों ने देवी-देवताओं की तस्वीरों को समझकर उनके आधार पर मूर्तियां बनाईं। ये मूर्तियां चीनी मिट्टी से बनाई जाती थीं। इस वजह से ये कांसे की मूर्तियों के मुकाबले अलग और महंगी होती थीं। यही वजह है कि इन मूर्तियों का अंदाज बेहद अनोखा है।