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नेपाल के 'विदेशी देवता', कैसे बन गए उत्तराखंड के स्थानीय भगवान?

नेपाल से आए राजकुमारों, योद्धाओं और सिद्ध पुरुषों की न्यायप्रियता और बलिदान ने उन्हें उत्तराखंड में पूजनीय बनाया, जहाँ वे बाहरी देवों के बजाय रक्षक स्थानीय देवताओं के रूप में स्वीकार किए गए।

Uttarakhand's Local Deities

उत्तराखंड के स्थानीय देवी-देवता, Photo Credit- Social Media

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उत्तराखंड की पहाड़ियों में गूंजती जागर की थाप और देव-डांगरों के नृत्य में नेपाल का इतिहास गहराई से रचा-बसा है। ऐतिहासिक रूप से, डोटी (पश्चिमी नेपाल) और कुमाऊं के बीच पारिवारिक और राजनैतिक संबंध इतने गहरे थे कि वहां के राजकुमार और रक्षक समय-समय पर सीमा पार कर यहां आए। इनमें कई ऐसे थे जिनकी मृत्यु के बाद समाज ने उन्हें दैवीय शक्ति के रूप में अपना लिया। 

 

आज गंगनाथ से लेकर गोरिया तक, इन देवताओं को 'विदेशी' नहीं बल्कि घर का बड़ा बुजुर्ग माना जाता है। इनकी पूजा पद्धति में 'जागर' का विशेष महत्व है, जिसमें उनके नेपाल से आने के कठिन रास्तों और चमत्कारों का विस्तार से वर्णन किया जाता है। यही कारण है कि हिमालय के इस पार और उस पार की आस्था एक ही धुरी पर टिकी है।

 

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नेपाल से उत्तराखंड तक- प्रमुख देवता

राजकुमार से देवता बने 'गंगनाथ'

गंगनाथ नेपाल के डोटी के राजकुमार थे। उन्हें वैराग्य हुआ और वह नाथ संप्रदाय में दीक्षित होकर कुमाऊं पहुंचे। स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, प्रेम और ईर्ष्या के एक दुखद घटनाक्रम में उनकी हत्या कर दी गई थी। उनके बलिदान के कारण उन्हें अन्याय के विरुद्ध लड़ने वाला देवता माना गया। आज वह अल्मोड़ा और आसपास के क्षेत्रों में विशेष पूजनीय हैं।

मोष्टामनु (मोष्टा देवता)

मोष्टा को भगवान शिव का अंश माना जाता है, जिनका उद्गम स्थल नेपाल का सिराड़ क्षेत्र है। पिथौरागढ़ में स्थित 'मोष्टामनु' मंदिर इसका जीवंत प्रमाण है। इन्हें बारिश और खेती का देवता माना जाता है। नेपाल से आए कत्यूरी और अन्य प्रवासियों के साथ यह आस्था उत्तराखंड पहुंची।

गोलू देवता (गोरिल/गोरिया)

गोलू देवता को कुमाऊं में 'न्याय का देवता' कहा जाता है। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, वह चम्पावत के राजा झालू राई के पुत्र थे और उनकी वंशावली कत्यूरी राजाओं से जुड़ी है, जिनके तार नेपाल से मिलते हैं। उनकी न्यायप्रियता के किस्से इतने प्रभावी थे कि उन्हें राजसी देवता से लोक देवता बनने में समय नहीं लगा।

 

गोलू देवता, Photo Credit- Wikipedia

ऐरी और कलवा भैरव

ऐरी को शिकार का देवता माना जाता है। इनकी उत्पत्ति का संबंध भी सीमावर्ती क्षेत्रों और नेपाल के जंगलों से जोड़ा जाता है।

कलवा भैरव को गंगनाथ और अन्य देवताओं के साथ रक्षक या द्वारपाल के रूप में पूजे जाते हैं। इनका चरित्र साहसी योद्धाओं का रहा है जो सीमा सुरक्षा और धर्म की रक्षा के लिए नेपाल से पहाड़ों की ओर आए थे।

 

नोट: इस खबर में लिखी गई बातें धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।

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