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ममलेश्वर मंदिर: पहलगाम का पवित्र मंदिर जहां गणेश को मिला हाथी का सिर

पहलगाम में स्थित ममलेश्वर मंदिर का विशेष स्थान है। आइए जानते हैं कि क्या है इस स्थान का इतिहास और कथा।

Image of Mamleshwar Mandir Pahalgam

ममलेश्वर मंदिर, पहलगाम(Photo Credit: Wikimedia Commons)

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जम्मू-कश्मीर के सुंदर पर्यटक स्थलों में से एक पहलगाम, इस समय आतंकी हमले के लिए सुर्खियों में बनी हुई है। इस आतंकी हमले में 26 पर्यटकों की मृत्यु हो गई थी, जो इस जगह घूमने आए थे। पहलगाम अपने खूबसूरती के लिए देश-विदेश में चर्चित लेकिन यह पर्यटन के साथ-साथ अपने धार्मिक महत्व के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां स्थित ममलेश्वर मंदिर एक प्राचीन शिव मंदिर है, जिसे लेकर कई पौराणिक कथाएं और मान्यताएं जुड़ी हुई हैं, जिसे ममल मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर भगवान शिव और भगवान गणेश की कहानियों से गहराई से जुड़ा हुआ है।

ममलेश्वर मंदिर की पौराणिक कथा

कहते हैं कि जब भगवान शिव अमरता का रहस्य माता पार्वती को सुनाने के लिए अमरनाथ गुफा की ओर जा रहे थे, तब उन्होंने पहलगाम क्षेत्र में विश्राम किया था। इसी दौरान उन्होंने यहां अपने गले का पवित्र हार यानी ‘माला’ उतारा था, जिससे इस स्थान का नाम ‘पहलगाम’ पड़ा, जिसका अर्थ है — 'पहला गांव' या 'मालाओं का गांव'। ममलेश्वर मंदिर उस जगह के पास स्थित है जहां शिवजी ने यह माला उतारी थी।

 

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इसके अलावा, एक और लोककथा के अनुसार, भगवान शिव ने अपने सारे बाहरी आभूषण और वाहन नंदी को भी यहीं छोड़ दिया था, ताकि अमरता के रहस्य को सुनाते समय कोई बाधा न आए। इस वजह से यह स्थान भक्तों के लिए अत्यंत पूज्य बन गया।

 

भगवान गणेश से जुड़ी मान्यता भी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ममलेश्वर मंदिर वह पवित्र स्थान है जहां माता पार्वती ने बालक गणेश को द्वारपाल बनाकर खड़ा किया था। उन्होंने आदेश दिया था कि बिना अनुमति के कोई भी अंदर न आए। जब भगवान शिव लौटे और गणेश ने उन्हें रोक दिया, तो क्रोधित होकर शिव ने उनका सिर काट दिया। बाद में, पार्वती जी के कहने पर शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर गणेश को लगाकर उन्हें नया जीवन दिया।

 

इसी घटना के कारण इस मंदिर को 'ममलेश्वर' (मत जाओ) कहा जाता है। कुछ लोग इसे 'स्तनपायी मंदिर' भी कहते हैं, क्योंकि यहां गणेश जी का बाल रूप पूजा जाता है। यह मंदिर शिव और पार्वती के पारिवारिक प्रेम तथा गणेश जी की भक्ति की अनूठी कहानी बताता है।

ममलेश्वर मंदिर का इतिहास

यह प्राचीन मंदिर लगभग 400 ईस्वी (1600 साल पहले) बना था। मध्यकाल में इसका जीर्णोद्धार कर पुनः पूजा के लिए खोला गया। प्रसिद्ध ग्रंथ राजतरंगिणी में इसे 'मम्मेश्वर मंदिर' नाम से उल्लेखित किया गया है। इसमें लिखा है कि राजा जयसिंह ने इसके शिखर पर स्वर्ण कलश स्थापित करवाया था, जिससे मंदिर की शोभा बढ़ी।

 

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ममलेश्वर मंदिर से जुड़ी मान्यताएं

भक्तों का विश्वास है कि जो भी सच्चे मन से इस मंदिर में पूजा करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। विशेषकर श्रावण माह और महाशिवरात्रि के समय यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं। यह भी मान्यता है कि यहां जलाभिषेक करने से पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

 

Disclaimer- यहां दी गई सभी जानकारी सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं।

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