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पाकिस्तान का कटास राज मंदिर, सतघरा मंदिरों का इतिहास जानिए

पाकिस्तान में स्थित कटास राज मंदिर अपनी विरासत और संरक्षण की चुनौतियों को लेकर हमेशा चर्चा में रहता है। कहा जाता है कि यह वही स्थान है जहां भगवान शिव के आंसू गिरे थे। आज प्रशासन इसे सहेजने की कोशिशों में जुटा है।

Katas Raj Temple

कटास राज मंदिर, Photo Credit- Wikipedia

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भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में भारतीय सभ्यता के प्रमाण मिलते हैं। खासकर पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में कई प्राचीन हिंदू मंदिर आज भी मौजूद हैं। ये मंदिर हजारों साल पुराने हैं और लोगों की आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बने हुए हैं। ऐसा ही एक प्रसिद्ध मंदिर पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित कटास राज मंदिर है। यह मंदिर अपनी प्राचीन वास्तुकला और धार्मिक महत्व के कारण पूरी दुनिया में जाना जाता है। इस मंदिर परिसर में कई अन्य प्राचीन मंदिर भी शामिल हैं, जो हजारों साल पुराने बताए जाते हैं।

 

कटास राज मंदिर पाकिस्तान के चकवाल जिले में स्थित है। लगभग 2000 साल पुराने इस मंदिर समूह को किला कटास भी कहा जाता है। माना जाता है कि इसका निर्माण हिंदू शाही काल में हुआ था। इसकी बनावट, गुंबद और स्थापत्य शैली आज भी उस समय की भव्यता और ऐतिहासिक महत्व को दर्शाते हैं।

 

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कटास राज मंदिर और मान्यता

इस्लामाबाद से दो घंटे की दूरी पर है पोथोहर पठार, जहां कटास राज मंदिर की स्थापना की गई। यहां की सबसे खास बात यहां मौजूद पवित्र तालाब (कुंड) है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान शिव अपनी पत्नी सती के वियोग में विलाप कर रहे थे, तब उनके आंसुओं से दो तालाब बने थे, जिनमें से एक यहां कटास राज में स्थित है। 

 

वहीं, एक अन्य मान्यता यह भी है कि महाभारत काल में पांडवों ने अपने वनवास के 12 साल यहीं बिताए थे और 'सतघरा' मंदिरों का निर्माण किया था। साथ ही यह भी कहा जाता है कि यहीं युधिष्ठिर ने यक्ष के कठिन सवालों के उत्तर दिए थे।मंदिर जिसे किला कटास के नाम से भी जाना जाता है, कई हिंदू मंदिरों का एक कॉम्प्लेक्स है जो एक-दूसरे से वॉकवे से जुड़े हुए हैं।


पंजाब क्षेत्र में ज्वालामुखी के बाद इसे हिंदुओं का दूसरा सबसे पवित्र स्थान माना जाता है। यहां की ऐतिहासिक बनावट और धार्मिक जुड़ाव को देखते हुए पाकिस्तान सरकार ने साल 2006 और 2017 में इसके मरम्मत का काम भी करवाया था। आज भी महाशिवरात्रि जैसे बड़े त्योहारों पर भारत से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

 

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इतिहास और संरक्षण की चुनौतियां

इतिहासकारों के लिए इस परिसर का सही समय बताना मुश्किल रहा है लेकिन अनुमान है कि ये मंदिर 7वीं शताब्दी के आसपास के हो सकते हैं। बंटवारे के बाद इस ऐतिहासिक धरोहर ने काफी उपेक्षा झेली। औद्योगिक गतिविधियों और सीमेंट फैक्ट्रियों की वजह से यहां की पवित्र झील सूखने लगी थी। 

 

हालांकि, 2017 में पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने न केवल फैक्ट्रियों पर जुर्माना लगाया बल्कि झील को दोबारा भरने और मंदिर के मरम्मत के सख्त निर्देश भी दिए।

 

राजनयिक उतार-चढ़ाव के बावजूद, पाकिस्तान अब भारतीय तीर्थयात्रियों को यहां आने की अनुमति दे रहा है। साल 2024 में भी महाशिवरात्रि के लिए 112 भारतीय नागरिकों को वीजा जारी किया गया था जो पिछले साल की तुलना में दोगुनी थी।

नोट: इस खबर में लिखी गई बातें धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।


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