भारतीय सनातन परंपरा में ध्रुव संकल्प को अटूट निश्चय, अदम्य साहस और ईश्वर में पूर्ण आस्था का प्रतीक माना जाता है। यह केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली वह प्रेरणा है जो बताती है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अगर संकल्प दृढ़ हो, तो लक्ष्य असंभव नहीं रहता। राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव की कहानी आज भी लोगों को यह संदेश देती है कि अपमान, बाधाएं और असफलताएं किसी के मार्ग को रोक नहीं सकतीं, अगर मनुष्य अपने उद्देश्य पर अडिग रहे।
बाल अवस्था में वन जाकर कठोर तपस्या करने वाले ध्रुव का यह संकल्प इतना प्रभावशाली था कि स्वयं भगवान विष्णु को प्रकट होना पड़ा और उसे अमर ध्रुव लोक का वरदान मिला। इसी अडिग निश्चय और लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण को आज 'ध्रुव संकल्प' कहा जाता है, जो आधुनिक जीवन में भी आत्मविश्वास, धैर्य और सफलता का मार्ग दिखाता है।
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ध्रुव संकल्प की पौराणिक कथा
राजा उत्तानपाद की दो रानियां थीं, जिनका नाम सुनीति और सुरुचि था। सुनीति से जन्मे थे ध्रुव, जबकि सुरुचि से जन्मा था उत्तम। राजा सुरुचि से ज्यादा प्रेम करते थे, इसलिए उसका पुत्र उत्तम राजमहल में विशेष अधिकार रखता था।
एक दिन बालक ध्रुव अपने पिता की गोद में बैठना चाहता था लेकिन सुरुचि ने उसे रोक दिया। उसने ध्रुव को अपमानित करते हुए कहा कि अगर वह राजा की गोद में बैठना चाहता है तो उसे अगले जन्म में मेरे गर्भ से जन्म लेना होगा। यह वचन बालक ध्रुव के हृदय को गहराई से आहत कर गया।
अपमान से व्यथित ध्रुव रोते हुए अपनी माता सुनीति के पास पहुंचे। सुनीति ने उसे समझाया कि राजा या रानी से नहीं, बल्कि भगवान विष्णु से ही न्याय मिलेगा। उन्होंने ध्रुव को भगवान की भक्ति और तपस्या का मार्ग बताया।
यह सुनकर मात्र पांच वर्ष का बालक ध्रुव घर छोड़कर वन चला गया। वहां उसे महर्षि नारद मिले। नारद ने पहले उसकी परीक्षा ली और तपस्या के कठिन मार्ग से उसे रोकने का प्रयास किया लेकिन ध्रुव अपने लक्ष्य से डिगा नहीं। अंत में नारद ने उसे 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का उपदेश दिया।
ध्रुव ने मदुवन में कठोर तपस्या शुरू की। समय के साथ उसकी तपस्या इतनी तेज हो गई कि उसने अन्न-पानी तक त्याग दिया। उसके तप से तीनों लोक कंपने लगे। अंत में भगवान विष्णु स्वयं उसके सामने प्रकट हुए।
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भगवान को देखकर ध्रुव भाव-विभोर हो गया। उसने पहले राजसिंहासन की कामना की थी लेकिन भगवान के दर्शन के बाद उसे अपनी इच्छा तुच्छ लगने लगी। फिर भी भगवान ने उसके तप और संकल्प से प्रसन्न होकर उसे अटल और अमर ध्रुव लोक प्रदान किया, जो आज ध्रुव तारा के रूप में जाना जाता है।
ध्रुव संकल्प का अर्थ और महत्व
ध्रुव संकल्प का अर्थ-
ऐसा अटूट और अडिग निश्चय, जो किसी भी परिस्थिति में डगमगाए नहीं। ध्रुव की तरह जिसने अपमान सहा लेकिन लक्ष्य नहीं छोड़ा, बाल अवस्था में भी तप और धैर्य दिखाया, सांसारिक सुख से ऊपर ईश्वर को रखा और इसी वजह से आज भी दृढ़ निश्चय और अटल विश्वास को 'ध्रुव संकल्प' कहा जाता है।
सीख-
ध्रुव की कथा सिखाती है कि उम्र नहीं, संकल्प बड़ा होना चाहिए, सच्चे मन से की गई तपस्या कभी व्यर्थ नहीं जाती, जो अपने लक्ष्य पर अडिग रहता है, वह अमर हो जाता है। यही वजह है कि भारतीय संस्कृति में ध्रुव संकल्प को जीवन का सर्वोच्च आदर्श माना गया है।