सनातन परंपरा और पुराणों में देवर्षि नारद को एक विशेष स्थान प्राप्त है। उन्हें ब्रह्मा का मानस पुत्र कहा जाता है लेकिन इसके पीछे केवल एक उपाधि नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक अर्थ और कथा छिपी है। माना जाता है कि नारद मुनि का जन्म किसी सामान्य प्रक्रिया से नहीं हुआ, बल्कि सृष्टि रचना के समय ब्रह्मा जी के तप, ध्यान और संकल्प से हुआ था। यही वजह है कि वह ज्ञान, भक्ति और वैराग्य के जीवंत प्रतीक माने जाते हैं। पुराणों में वर्णित उनकी जन्म कथा यह बताती है कि कैसे एक साधारण जीवन में होकर उन्होंने देवर्षि का पद प्राप्त किया और तीनों लोकों में भगवान विष्णु की भक्ति का प्रचार किया।
नारद मुनि को ब्रह्मा का मानस पुत्र इसलिए कहा जाता है क्योंकि उनका जन्म किसी भौतिक माता-पिता से नहीं, बल्कि ब्रह्मा जी के मन, संकल्प और तप से हुआ माना जाता है। 'मानस' का अर्थ होता है मन से उत्पन्न हुआ होता है। पुराणों के अनुसार, सृष्टि रचना के प्रारंभ में ब्रह्मा जी ने जब ध्यान किया और संसार में ज्ञान, भक्ति और धर्म का प्रचार करने का संकल्प लिया, तब उसी दिव्य संकल्प से नारद मुनि का प्राकट्य हुआ।
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नारद मुनि के जन्म की कथा
भागवत पुराण, विष्णु पुराण और नारद पुराण में नारद मुनि की जन्म कथा का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार, पूर्व जन्म में नारद एक गंधर्व या कुछ मान्यताओं में एक दासी पुत्र थे। बचपन में वह अपनी माता के साथ संतों की सेवा करते थे। संतों के सत्संग, हरिकथा और भगवान विष्णु के नाम-स्मरण से उनके भीतर गहरी भक्ति जागृत हो गई।
मान्यता के अनुसार, उनकी माता की आकस्मिक मृत्यु हो गई थी। इस घटना ने उन्हें संसार की नश्वरता का बोध कराया। इसके बाद उन्होंने वन में जाकर कठोर तप और साधना की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान दिया कि अगले जन्म में वह देवर्षि नारद के रूप में जन्म लेंगे, जो तीनों लोकों में भक्ति और ज्ञान का प्रचार करेंगे।
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मान्यता के अनुसार, इसके बाद सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा जी के ध्यान और मानस संकल्प से नारद मुनि का प्रकट होना हुआ। इसी वजह से उन्हें ब्रह्मा का मानस पुत्र कहा जाता है। जन्म लेते ही नारद मुनि को ब्रह्मज्ञान, वीणा, दिव्य दृष्टि और त्रिलोक गमन की शक्ति प्राप्त थी।
नारद मुनि का उद्देश्य
नारद मुनि का मुख्य उद्देश्य-
- भगवान विष्णु की भक्ति का प्रचार
- राजाओं, ऋषियों और सामान्य जन को धर्म का मार्ग दिखाना
- अहंकार तोड़कर सत्य और भक्ति की ओर प्रेरित करना
- वह जानबूझकर कई बार ऐसी घटनाएं घटित कराते थे, जिन्हें लोग 'नारद लीला' कहते हैं लेकिन उनका उद्देश्य हमेशा लोककल्याण ही होता था।