तमिलनाडु की पारंपरिक संस्कृति से जुड़ा जल्लीकट्टू एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। हर साल पोंगल के मौके पर आयोजित होने वाला यह सांड काबू करने का खेल जहां एक ओर तमिल पहचान और परंपरा का प्रतीक माना जाता है, वहीं दूसरी ओर इसे लेकर पशु अधिकारों और सुरक्षा को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं। हाल के वर्षों में जल्लीकट्टू को लेकर सुप्रीम कोर्ट, राज्य सरकार और सामाजिक संगठनों के बीच लंबी बहस देखने को मिली है।
एक तरफ इसे हजारों साल पुरानी सांस्कृतिक विरासत बताया जा रहा है, तो दूसरी ओर इसे जानवरों के प्रति क्रूरता से जोड़कर देखा जा रहा है। ऐसे में पोंगल के साथ ही जल्लीकट्टू का आयोजन न सिर्फ गांवों में उत्सव का माहौल बनाता है, बल्कि यह परंपरा, कानून और आधुनिक सोच के टकराव की एक बड़ी मिसाल भी बन चुका है। इस साल मदुरै के पास पालमेडु और अलंगानल्लूर में पारंपरिक जल्लीकट्टू कार्यक्रम 16 जनवरी और 17 जनवरी को मनाया जाएगा।
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जल्लीकट्टू क्या होता है
जल्लीकट्टू को अंग्रेजी में Bull Taming Sport कहा जाता है। इसमें एक ताकतवर देशी सांड (बैल) को खुली जगह पर छोड़ा जाता है और युवक उस सांड को उसके कूबड़ को पकड़कर काबू में करने की कोशिश करते हैं। इसमें न तो सांड को मारा जाता है और न ही उसका वध किया जाता है। उद्देश्य सिर्फ यह दिखाना होता है कि कौन युवक सांड की ताकत, गति और उग्रता को नियंत्रित कर सकता है।
जल्लीकट्टू क्यों किया जाता है
परंपरागत रूप से जल्लीकट्टू का मकसद मनोरंजन से ज्यादा देशी नस्ल के सांडों की पहचान और संरक्षण रहा है। पुराने समय में खेती के लिए मजबूत और स्वस्थ बैलों की जरूरत होती थी। जल्लीकट्टू के जरिए यह देखा जाता था कि कौन सा सांड सबसे ताकतवर, फुर्तीला और सहनशील है। ऐसे सांडों को बाद में प्रजनन के लिए चुना जाता था, जिससे अच्छी नस्ल आगे बढ़े। इसके अलावा, यह युवाओं की बहादुरी, ताकत और साहस दिखाने का भी एक माध्यम था।
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जल्लीकट्टू से जुड़ी प्रथा और परंपरा
जल्लीकट्टू आमतौर पर मकर संक्रांति के समय मनाए जाने वाले पोंगल पर्व के दौरान आयोजित किया जाता है। यह पर्व खेती और फसल कटाई से जुड़ा होता है। गांवों में इसे उत्सव की तरह मनाया जाता है। सांडों को पहले अच्छे से खिलाया-पिलाया जाता है, सजाया जाता है और उनके सींगों पर रंग लगाए जाते हैं। कई जगह सांड के सींगों पर कपड़ा या झंडा बांधा जाता है। परंपरा के अनुसार, सांड को परिवार के सदस्य की तरह सम्मान दिया जाता है।
जल्लीकट्टू कैसे किया जाता है
जल्लीकट्टू के आयोजन के लिए एक खुला मैदान चुना जाता है। सांडों को एक संकरे रास्ते या बाड़े से बाहर छोड़ा जाता है। जैसे ही सांड बाहर आता है, युवक उसे उसके कूबड़ को पकड़कर कुछ दूरी तक रोकने या साथ चलने की कोशिश करते हैं। जो युवक सांड को तय समय या दूरी तक संभाल लेता है, उसे विजेता माना जाता है। इस दौरान सांड को घायल करने या हथियार इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं होती। हालांकि, वास्तविकता में कई बार हादसे भी हो जाते हैं, जिसकी वजह से यह खेल विवादों में रहा है।
जल्लीकट्टू कब और कैसे शुरू हुआ
इतिहासकारों के अनुसार, जल्लीकट्टू की परंपरा 2000 साल से भी ज्यादा पुरानी मानी जाती है। तमिल साहित्य, खासकर संगम काल की रचनाओं में इसका उल्लेख मिलता है। पुराने तमिल ग्रंथों में इसे 'एरुथु कत्तु' कहा गया है, जिसका अर्थ है सांड को वश में करना। उस दौर में यह राजाओं और जमींदारों के संरक्षण में होने वाला आयोजन था। गांव के सबसे बहादुर युवक को समाज में विशेष सम्मान मिलता था और कई बार विवाह के लिए भी ऐसे युवकों को प्राथमिकता दी जाती थी।
विवाद और आधुनिक दौर
आधुनिक समय में जल्लीकट्टू को लेकर पशु अधिकार संगठनों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इसमें जानवरों के साथ क्रूरता होती है। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने एक समय पर इस पर रोक भी लगाई थी। बाद में तमिलनाडु सरकार ने कानून में बदलाव कर इसे सांस्कृतिक परंपरा के रूप में फिर से अनुमति दी। आज यह आयोजन सरकारी नियमों, पशु चिकित्सकों की निगरानी और सुरक्षा मानकों के तहत कराया जाता है।