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मोक्ष या मन की शांति, हरिद्वार के ब्रह्मकुंड घाट का अनसुना सच क्या है?

हरिद्वार में ब्रह्मकुंड घाट में डुबकी लगाने से मोक्ष मिलने की मान्यता है। इस घाट का अनसुना सच क्या है, जानिए।

Brahmakund Ghat

ब्रह्मकुंड घाट, Photo Credit- Social media

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हरिद्वार में गंगा नदी पर स्थित प्रसिद्ध ब्रह्मकुंड घाट का सनातन धर्म में विशेष महत्व है। माना जाता है कि यहां स्नान करने से मोक्ष मिलता है। धार्मिक कथाओं के मुताबिक, राजा श्वेत की कठोर तपस्या के कारण इस घाट पर भगवान ब्रह्मा जी विराजमान हुए थे। इस स्थान को हर की पौड़ी के नाम से भी जाना जाता है। श्रद्धालुओं के लिए यहां स्नान करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। जहां एक ओर कई लोगों का मानना है कि इस घाट में स्नान करने से मोक्ष मिलता है, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग मानते हैं कि यहां स्नान करने से मन को शांति और सुकून मिलता है।


ब्रह्मकुंड घाट में हर साल लाखों लोग स्नान करने आते हैं। कई लोग कांवड़ यात्रा के दौरान भी यहां आकर स्नान करते हैं। इसके अलावा मौनी अमावस्या, कार्तिक पूर्णिमा और कुंभ मेले जैसे अवसरों पर यहां गंगा स्नान का विशेष महत्व होता है। माना जाता है कि इन दिनों गंगा का जल अमृत के समान हो जाता है। अब सवाल उठता है कि ऐसी क्या वजह है कि ब्रह्मकुंड में स्नान से मोक्ष की प्राप्ति मानी जाती है। आइए, एक अनसुनी कथा के जरिए इस रहस्य को समझते हैं।

 

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ब्रह्मकुंड में स्नान करने से क्यों मिलता है मोक्ष?


धार्मिक कथाओं के अनुसार जब देवताओं और राक्षसों के सहयोग से समुद्र मंथन हुआ, तब वासुकी नाग की पूंछ देवताओं के हाथ में थी और उसका सिर राक्षसों के पास था। इस समुद्र मंथन से कुल 14 रत्न निकले थे, जिनमें अमृत का कलश भी शामिल था।


कथा के अनुसार जब अमृत कलश को राक्षसों से बचाकर ले जाया जा रहा था, तब उसकी कुछ बूंदें पृथ्वी पर विभिन्न स्थानों पर गिरीं। इन्हीं स्थानों में एक हरिद्वार का ब्रह्मकुंड भी माना जाता है। इसी वजह से कुंभ, मौनी अमावस्या, कार्तिक पूर्णिमा, गंगा दशहरा और गंगा सप्तमी जैसे पवित्र दिनों में ब्रह्मकुंड का जल अमृत के समान माना जाता है। इन दिनों पर यहां स्नान करने से मोक्ष की मिलती है यह माना जाता है।

 

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कैसे पड़ा हर की पौड़ी का नाम ब्रह्मकुंड?


पौराणिक कथाओं के अनुसार हर की पौड़ी के पास राजा श्वेत भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या कर रहे थे। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ब्रह्मा प्रकट हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा था। तब राजा श्वेत ने इच्छा जताई कि इस स्थान को भगवान का दर्जा मिले। उनकी इस कामना को स्वीकार करते हुए भगवान ब्रह्मा यहां विराजमान हुए। तभी से इस स्थान को ब्रह्मकुंड के नाम से जाना जाने लगा। इस घाट पर लोग अपने पूर्वजों की अस्थियां भी विसर्जित करते हैं क्योंकि मान्यता है कि गंगा में अस्थि विसर्जन से मृत आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है।कैसे जाएं ब्रह्मकुंड घाट?


ब्रह्मकुंड पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को सबसे पहले अपने राज्य के नजदीकी रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट या बस अड्डे से देहरादून या हरिद्वार पहुंचना होता है। इसके बाद वहां से बस, टैक्सी या निजी वाहन के माध्यम से आसानी से हर की पौड़ी स्थित ब्रह्मकुंड घाट तक पहुंचा जा सकता है।

 

डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसकी पुष्टि नहीं की जाती है।

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