उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के पास गढ़मुक्तेश्वर मंदिर स्थित है जिसे गढ़वाल राजाओं ने बसाया था। गढ़मुक्तेश्वर धार्मिक और पौराणिक दृष्टि से बेहद खास है। इसे प्राचीन काल में 'शिवबल्लभपुर' के नाम से जाना जाता था। मान्यता है कि इसी स्थान पर भगवान परशुराम ने शिव मंदिर की स्थापना की थी। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका ऐतिहासिक महत्व है जो त्रेतायुग से लेकर महाभारत काल तक फैला हुआ है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार महर्षि दुर्वासा की तपस्या में बाधा डालने के कारण शिव के गणों को 'पिशाच' बनने का श्राप मिला था। इस श्राप से मुक्ति के लिए उन्होंने इसी स्थान पर भगवान शिव की कठोर आराधना की थी। शिव पुराण कहता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन उनकी तपस्या सफल हुई और महादेव ने उन्हें मुक्त किया, जिसके बाद इस जगह का नाम 'गणमुक्तेश्वर' और कालांतर में 'गढ़मुक्तेश्वर' पड़ा।
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महाभारत से संबंध
पांडवों और राजा परीक्षित से नाता इस स्थान का गहरा संबंध महाभारत से भी है। कहा जाता है कि युद्ध में हुए बर्बादी और अपनों को खोने के दुख से उबरने के लिए युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण की सलाह पर यहीं पिंडदान किया था।
इसके अलावा, राजा परीक्षित ने भी मोक्ष की कामना के साथ यहां का रुख किया था। आज भी यहां कार्तिक शुक्ल अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक विशाल मेला लगता है, जहां लाखों लोग गंगा में डुबकी लगाकर अपने पूर्वजों की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं।
खंडित शिवलिंग
नक्का कुआं और खंडित शिवलिंग का रहस्य मंदिर परिसर में एक प्राचीन बावड़ी है जिसे 'नक्का कुआं' कहा जाता है। इसके बारे में कहा जाता है कि महाराज नृग को गिरगिट की योनि से यहीं मुक्ति मिली थी। वहीं, मंदिर में स्थापित शिवलिंग पर एक निशान है, जिसे परशुराम के फरसे का प्रहार माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी प्रहार के बाद शिव गणों को पूरी तरह मुक्ति मिली थी।
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श्रद्धालुओं के लिए विशेष आज यह मंदिर 'झार खंडेश्वर' के नाम से भी जाना जाता है। यहां गंगा दशहरा पर पितृ दोष निवारण के लिए विशेष पूजा-अर्चना होती है। श्रद्धालु यहां मन्नत मांगने, बच्चों का मुंडन संस्कार कराने और पिंडदान जैसे अनुष्ठान करने दूर-दूर से आते हैं। मुक्ति घाट और महादेव मंदिर भक्तों के दर्शन के लिए पूरा दिन खुले रहते हैं।
नोट: इस खबर में लिखी गई बातें धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।