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देशभर से अलग अंदाज, क्यों अलग है यूपी की होली?

उत्तर प्रदेश की होली देशभर से बिल्कुल अलग है। यहां की होली में भक्ति, परंपरा और संस्कृति का संगम देखने को मिलेगा। यहां हर क्षेत्र की अपनी एक अलग कहानी और मनाने का निराला अंदाज है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर, AI Generated Image

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उत्तर प्रदेश की होली अपनी अलग तरह की होली के लिए दुनिया में प्रसिद्ध है। यहां होली केवल गुलाल उड़ाने तक सीमित नहीं है बल्कि यह लोक संस्कृति के उन रंगो को देखने का नजरिया है जो सदियों से चले आ रहे हैं। प्रदेश की होली में कृष्ण और राधा के प्रेम, प्रहलाद की भक्ति  और लोक गीतों की मिठास जुड़ी है। ब्रज की गलियों से लेकर अवध के दरबारों तक, होली के हर रंग में एक गहरा आध्यात्मिक और सामाजिक अर्थ छिपा होता है, जो इसे देश के अन्य हिस्सों से बिल्कुल अलग बनाता है।

 

इस प्रदेश में होली का उत्सव हफ्तों पहले शुरू हो जाता है। कहीं लाठियों से मार पड़ती है, तो कहीं फूलों की वर्षा होती है। उत्तर प्रदेश की होली में 'फाग' और 'होरी' जैसे लोक गीतों की गूंज सुनाई देती है। यहां की होली में हर कोई बस 'होली है!' के जयकारे के साथ एक-दूसरे के रंग में रंग जाता है।

 

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यूपी की होली के कई रंग

ब्रज की लट्ठमार और फूलों वाली होली

मथुरा, वृंदावन और बरसाना की होली सबसे अनोखी है। बरसाना में लट्ठमार होली खेली जाती है, जहां नंदगांव के पुरुष बरसाना की महिलाओं के साथ होली खेलने आते हैं और महिलाएं प्रतीकात्मक रूप से उन पर लाठियां बरसाती हैं। वहीं, वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में फूलों की होली खेली जाती है, जो शुद्धता और प्रेम का प्रतीक है।

काशी की 'मसान' होली

वाराणसी में होली का एक अतरंगी रूप देखने को मिलता है। यहां महाश्मशान पर चिता भस्म से होली खेली जाती है। मान्यता है कि भगवान शिव अपने गणों के साथ यहां होली खेलते हैं। यह जीवन और मृत्यु के उत्सव को एक साथ दर्शाता है।

अवध की 'होरी'

लखनऊ और अयोध्या जैसे जगहों में होली बड़े ही शांती और सांस्कृतिक ढंग से मनाई जाती है। यहां 'फाग' गाने की परंपरा है और नवाबों के समय से ही इसे हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में मनाया जाता रहा है।

हुरंगा और टेसू के फूल

ब्रज के दाऊजी मंदिर में 'हुरंगा' का आयोजन होता है, जो लट्ठमार होली का ही एक अधिक आक्रामक और आनंदमयी रूप है। इसके अलावा, पारंपरिक रूप से यूपी में टेसू यानी पलाश के फूलों से प्राकृतिक रंग बनाने की परंपरा रही है, जो स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद मानी जाती है।

 

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प्रयागराज की होली

प्रयागराज में होली सामान्य होली से काफी अलग और बहुत ज्यादा जोश‑भरी रहती है, खास तौर पर लोकनाथ, दारागंज, मुट्ठीगंज और चौक इलाकों में। यहां लोकनाथ से शुरू होकर चौक‑थेठेरी बाजार तक लोग जमकर कपड़े फाड़कर 'कपड़ा‑फाड़ होली' खेलते हैं। यूवा एक‑दूसरे के कपड़े फाड़ देते हैं और बिना शर्ट के रंगों और पानी में नाचते रहते हैं। होलिका दहन के बाद भी तीन‑चार दिन तक रंग‑खेल चलता है। 

 

चौक और लोकनाथ के इलाकों में लोग नाकाबंदी करके रंगों वाले पानी से भरे टैंकर लगाकर भीड़ पर जमकर पानी डालते हैं, जो आम होली‑सेरेमनी से ज्यादा स्ट्रीट‑फेस्टिवल जैसा लगता है।


यूपी में होली केवल मनोरंजन के लिए बल्कि प्रदेश की परंपराओं को जिंदा रखने का एक तरीका है। इसमें टेसू के फूल, फाग लोकगीत और गुजिया की मिठास का मेल रहता है। प्रदेश में कई तरीके के होली मनाए जाने के कारण यह बाकी देशों में मनाई जाने वाली होली से अलग है। 

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