शिव पुराण में भगवान शिव से जुड़ी कई कहानियों और किस्सें का उल्लेख मिलता है। उन्हीं कथाओं में भगवान शिव के कृतिवासेश्वर नाम से जुड़ी एक कथा भी है। कृतिवास शब्द का अर्थ हाथी की खाल धारण करने वाला होता है। शिव पुराण की कथा के मुताबिक गजासुर का वध करने के बाद भगवान शिव को यह नाम मिला। गजासुर ऐसा असुर था, जिसने देवी-देवताओं का आशीर्वाद पाने के लिए नियमित रूप से कठोर तपस्या की थी। जब उसे भगवान का आशीर्वाद मिल गया तो उसने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया।
शिव पुराण में गजासुर के बुरे कर्मों और उसके वध की पूरी कथा बताई गई है। गजासुर की तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा देव ने उसे वरदान दिया था। इसके बाद गजासुर ने घोर अन्याय और पाप कर्म किए, जिसकी वजह से भगवान शिव ने उसका वध किया। अब सवाल उठता है कि आखिर किस कारण गजासुर की वजह से भगवान शिव को नया नाम मिला।
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गजासुर ने क्यों की तपस्या
शिव पुराण की कथा के मुताबिक गजासुर के पिता महिषासुर थे, जो बेहद शक्तिशाली और प्रतापी थे। उनका वध देवताओं की रक्षा के लिए किया गया था। जब गजासुर को अपने पिता के वध के बारे में पता चला तो वह बेहद दुखी हुआ। साथ ही उसे बहुत क्रोध भी आया। इसके बाद उसने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए ब्रह्मा देव की कठोर तपस्या शुरू कर दी।
घोर तपस्या करने के बाद भी ब्रह्मा देव उसके सामने प्रकट नहीं हुए। इसके बावजूद गजासुर ने अपनी तपस्या जारी रखी। उसकी कठोर तपस्या को देखकर अग्नि देव चिंतित हो गए। उन्होंने ब्रह्मा देव से गजासुर के पास जाने का आग्रह किया। अग्नि देव की बात मानकर ब्रह्मा देव गजासुर के सामने प्रकट हुए और उससे वरदान मांगने को कहा। तब गजासुर ने ब्रह्मा देव से अजेय और महाबली होने का वरदान मांगा। ब्रह्मा जी ने उसे यह आशीर्वाद दिया और वहां से चले गए।
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वरदान के घमंड में किए अनेक पाप
जब गजासुर को भगवान से आशीर्वाद मिल गया तो उसे अपनी शक्ति पर घमंड हो गया। उसने न सिर्फ पृथ्वी लोक बल्कि तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया। उसके अत्याचारों से देवी-देवता और सामान्य लोग सभी परेशान हो गए। एक बार गजासुर काशी पहुंच गया और वहां के लोगों को सताने लगा। काशीवासियों ने भगवान शिव की आराधना कर गजासुर के अत्याचारों से मुक्ति की प्रार्थना की। इसके बाद भगवान शिव ने लोगों की रक्षा के लिए गजासुर का वध किया।
शिव भगवान का नाम पड़ा कृतिवासेश्वर
जब भगवान शिव काशी के विश्वनाथ स्वरूप में गजासुर के सामने पहुंचे तो दोनों के बीच युद्ध हुआ। इसी दौरान जब भगवान शिव ने अपना शस्त्र उठाया, तब गजासुर युद्ध करने के बजाय उनकी आराधना करने लगा। उसकी भक्ति देखकर भगवान शिव प्रसन्न हो गए।
तब गजासुर ने कहा, 'हे शिव भगवान, यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो मेरी अंतिम इच्छा पूरी कीजिए।' गजासुर ने अपनी आखिरी इच्छा व्यक्त करते हुए कहा कि 'आप मेरे शरीर की खाल धारण कर लें, ताकि आपका नाम कृतिवास अर्थात कृतिवासेश्वर के रूप में प्रसिद्ध हो जाए।' भगवान शिव ने उसकी अंतिम इच्छा स्वीकार कर ली और गजासुर की खाल धारण की। तभी से भगवान शिव कृतिवासेश्वर नाम से भी पूजे जाते हैं।
नोट- यह लेख धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं पर आधारित है। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।