जैन परंपरा में जब कोई व्यक्ति मुनि संघ में शामिल होने का निर्णय लेता है तो उसे सीधे दीक्षा नहीं दी जाती। इससे पहले 'वैराग्य काल' होता है, जिसमें मुमुक्षु यानी दीक्षा लेने वाले के भीतर के त्याग को परखा जाता है। जब गुरु दीक्षा की अनुमति दे देते हैं तो परिवार और समाज को उसे एक राजा की तरह विदाई दी जाती है। इसे 'दीक्षा कल्याणक' के उत्सव के रूप में मनाया जाता है, जिसमें मेंहदी लगाना एक महत्वपूर्ण रस्म है।
दीक्षा से पूर्व होने वाली मेंहदी की रस्म का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि व्यक्ति अपने जीवन के अंतिम सांसारिक श्रृंगार को अपना रहा है। इसके बाद वह समस्त बाह्य आभूषणों और सौंदर्य प्रसाधनों का त्याग कर 'अपरिग्रह' और 'संयम' के मार्ग पर चल पड़ता है। यह इस बात का संकेत है कि अब भक्त के जीवन में केवल आत्मिक शांति का रंग चढ़ेगा, संसार का नहीं।
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दीक्षा पूर्व की प्रमुख रस्में और प्रक्रिया
मेहंदी और श्रृंगार
जिस तरह किसी की शादी में मेहंदी रची जाती है, वैसे ही दीक्षा को 'दीक्षा रूपी दुल्हन' से मिलन माना जाता है। हाथों में मेहंदी लगाना इस बात का प्रतीक है कि मुमुक्षु ने संसार के सभी राग-रंग देख लिए हैं और अब वह इन्हें हमेशा के लिए पीछे छोड़ रहा है।
बिनौली/विदाई जुलूस
दीक्षार्थी को दूल्हे या दुल्हन की तरह सजाया जाता है और पूरे शहर में गौरव के साथ उनका जुलूस निकाला जाता है। इसका अर्थ यह है कि वह स्वेच्छा से, बिना किसी दबाव के, खुशी-खुशी वैभव को छोड़कर संयम के मार्ग पर बढ़ रहा है।
केसर छांटना और गोद भराई
समाज के लोग दीक्षार्थी पर केसर छिड़कते हैं और उनके वैराग्य की प्रशंसा करते हैं। यह एक भावनात्मक समय होता है जहां परिवार अपने प्रियजन को मोक्ष मार्ग के लिए समर्पित करता है।
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गुरु की आज्ञा और परीक्षा
संघ में शामिल होने से पहले महाराज और संघ के वरिष्ठ सदस्य मुमुक्षु की शारीरिक और मानसिक क्षमता की परीक्षा लेते हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वह कठिन मुनि धर्म जैसे पैदल चलना, केशलोंच करना और उपवास आदि का पालन कर पाएगा।
नोट: इस खबर में लिखी गई बातें धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।