क्या भारत-ब्राजील के बीच क्रिटिकल मिनरल डील चीन को काउंटर कर पाएगा?
भारत और ब्राजील ने क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर समझौता किया है, लेकिन देखने वाली बात है कि क्या यह चीन के एकाधिकार के सामने टिक पाएगा?

प्रतीकात्मक तस्वीर । Photo Credit: PTI
इलेक्ट्रिक वाहनों (EV), सेमीकंडक्टर और रक्षा तकनीक की दौड़ ने दुनिया को एक नई भू-आर्थिक वास्तविकता के सामने खड़ा कर दिया है, वह हैं क्रिटिकल मिनरल्स। लिथियम, निकेल, कोबाल्ट, कॉपर और रेयर अर्थ एलिमेंट्स (REE) अब तेल-गैस जितने रणनीतिक हो चुके हैं। समस्या यह है कि इन खनिजों की रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग पर भारी वर्चस्व एक ही देश का है और वह देश है चीन। ऐसे में भारत और ब्राजील के बीच उभरती साझेदारी सिर्फ व्यापारिक करार नहीं, बल्कि सप्लाई-चेन को डाइवर्सीफाई करने की ठोस कोशिश है।
भारत 2070 नेट-जीरो लक्ष्य, EV अपनाने और सेमीकंडक्टर विनिर्माण को तेज कर रहा है; वहीं ब्राज़ील के पास खनिज भंडार, खनन-तकनीकी अनुभव और संसाधन-समृद्ध भूगोल है। सवाल है कि क्या यह साझेदारी चीन पर निर्भरता कम कर पाएगी? और क्या ब्राज़ील वास्तव में वह वैकल्पिक स्तंभ बन सकता है, जिसकी तलाश भारत और ‘ग्लोबल साउथ’ को है? इस खबर में हम इसी बार पर चर्चा करेंगे।
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निर्भरता असल में कहां है?
बहस अक्सर 'खनिज कहां से आएंगे' पर रुक जाती है, जबकि वास्तविक नियंत्रण रिफाइनिंग/प्रोसेसिंग में है। अब अगर चीन की बात करें तो चीन के पास रेयर अर्थ प्रोसेसिंग की ~60–70% वैश्विक क्षमता, लिथियम रिफाइनिंग में 50%+ हिस्सेदारी है। इसका मतलब है कि अगर भारत ब्राज़ील से अयस्क खरीद भी ले, तो उसे बैटरी-ग्रेड रसायन या मैग्नेट में बदलने के लिए अपनी या साझी रिफाइनिंग क्षमता खड़ी करनी होगी, नहीं तो चीन पर निर्भरता खत्म नहीं होगी।
क्या ब्राज़ील ठोस विकल्प हो सकता है?
अगर भंडार की बात करें तो ब्राज़ील निकेल, लिथियम और संभावित रेयर अर्थ्स में महत्वपूर्ण भंडार रखता है; कॉपर और आयरन अयस्क में तो वह पहले से स्थापित निर्यातक है। यह भारत के लिए सप्लाई-डायवर्सिफिकेशन का वास्तविक अवसर है।
साथ ही ब्राजील के पास तमाम ऐसी बड़ी कंपनियां भी हैं जो माइनिंग और लॉजिस्टिक्स उपलब्ध कराती हैं साथ ही इसके पास पोर्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर भी मौजूद है। इससे दीर्घकालिक ऑफ-टेक कॉन्ट्रैक्ट संभव हो सकते हैं।
भारत की ताकत बड़ा बाजार, EV व नवीकरणीय ऊर्जा के लक्ष्यों के कारण बढ़ती मांग और औद्योगिक नीतियां ब्राजील के रेयर अर्थ संसाधनों के लिए अच्छी पूरक हो सकती हैं और अगर संयुक्त रिफाइनिंग/केमिकल प्रोसेसिंग इकाइयों पर काम किया जाता है तो ये चीन के बाहर वैल्यू-एडिशन का विकल्प बना सकती हैं। इसलिए ब्राज़ील 'सप्लाई का विकल्प' दे सकता है; लेकिन 'वैल्यू-चेन का विकल्प' तभी बनेगा जब प्रोसेसिंग निवेश साथ चले।
क्या निर्भरता वाकई कम होगी?
जहां चीन पर निर्भरता की बात है तो यह कई फैक्टर्स पर निर्भर करता है। अगर सिर्फ कच्चा माल आयात कि जाए तो जोखिम घटेगा, पर आंशिक रूप से। अगर रिफाइनिंग के लिए भारत चीन पर निर्भर रहा तो इसका कोई भी फायदा नहीं होगा।
लेकिन अगर जॉइंट रिफाइनिंग की व्यवस्था की जाती है तो यह काम करेगा। इसके लिए दोनों देशों को बैटरी-ग्रेड केमिकल्स का उत्पादन भारत या ब्राज़ील में करना होगा, कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश करनी होगी।
क्या हैं चुनौतियां
1) रिफाइनिंग क्षमता का गैप
रिफाइनिंग प्लांट कैपिटल-इंटेंसिव, तकनीकी रूप से जटिल और पर्यावरण के रेग्युलेशन से बंधे होते हैं। चीन ने यह इकोसिस्टम दशकों में बनाया है; भारत-ब्राज़ील को समय और भारी निवेश चाहिए।
2) कीमत में अंतर
चीन से रेयर अर्थ के उत्पादन के मुकाबले कीमतों को स्थिर रखना होगा। यदि ब्राज़ील-भारत से निर्मित रेयर अर्थ महंगा पड़ा तो उद्योग सस्ते आपूर्ति की ओर खुद ही झुक सकता है।
हालांकि, यह केवल संसाधनों के खरीद तक ही सीमित नहीं हो सकता, बल्कि इसे एक समग्र सप्लाई-चेन साझेदारी के रूप में देखना होगा। सबसे पहले, 5–10 वर्षों के दीर्घकालिक ऑफ-टेक समझौते (भविष्य में एक निश्चित खरीद का समझौता) किए जाएं जिनमें मूल्य का स्पष्ट फॉर्मूला तय हो, ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार की अस्थिरता से बचाव हो सके और उद्योगों को लागत का पूर्वानुमान मिल सके।
दूसरा, केवल आयातक की भूमिका में रहने के बजाय भारतीय कंपनियों को ब्राजील की खनन परिसंपत्तियों में इक्विटी निवेश या जॉइंट वेंचर के जरिए हिस्सेदारी लेनी चाहिए जैसे कि Vale S.A. जैसी बड़ी कंपनियों के साथ साझेदारी ताकि आपूर्ति पर दीर्घकालिक नियंत्रण और प्राथमिकता सुनिश्चित हो।
तीसरा, वैल्यू-एडिशन पर जोर देते हुए भारत में बैटरी-ग्रेड केमिकल्स और रिफाइनिंग क्लस्टर विकसित किए जाएं, जबकि ब्राजील में प्री-प्रोसेसिंग की व्यवस्था हो; इससे दोनों देशों को वैल्यू चेन में लाभ मिलेगा और चीन की रिफाइनिंग क्षमता पर निर्भरता घटेगी।
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चौथा, लिथियम, निकल और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की रीसाइक्लिंग को बढ़ाकर सेकेंडरी सप्लाई 10–20% तक बढ़ाई जा सकती है, जिससे आयात जोखिम कम होगा। अंततः, बहुपक्षीय समन्वय जैसे BRICS या G20 जैसे मंचों पर मानकीकरण, पारदर्शिता और विश्वसनीय सप्लाई-चेन नियमों को बढ़ावा देकर इस अवसर को एक ठोस रणनीतिक ‘काउंटर’ में बदला जा सकता है।
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