क्या है IFD जिसके लिए चीन जोर लगा रहा पर भारत की साफ ‘न’ है?
IFD को लेकर चीन पूरी तरह से जोर लगा रहा है। 120 देश इसके समर्थन में भी आ गए हैं लेकिन भारत इसके विरोध में है। वह अकेला होकर भी इस पर अड़ा है।

प्रतीकात्मक तस्वीर । Photo Credit: AI Generated
वैश्विक व्यापार व्यवस्था में World Trade Organization (WTO) के तहत प्रस्तावित Investment Facilitation for Development (IFD) Agreement को लेकर बहस तेज हो चुकी है। जहां 120 से अधिक देश इसे इन्वेस्टमेंट बढ़ाने और व्यापार को आसान बनाने वाला समझौता मान रहे हैं, वहीं भारत ने इसके प्रति साफ तौर पर ‘न’ कहने का रुख अपनाया है। भारत का यह विरोध सतही तौर पर तकनीकी लग सकता है लेकिन इसके पीछे गहरे आर्थिक, संस्थागत और राजनीतिक कारण छिपे हुए हैं।
अब तक इसके पक्ष में 120 से ज्यादा देश आ चुके हैं। चीन जैसे देश IFD का समर्थन इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इससे वैश्विक इन्वेस्टमेंट के नियम सरल होंगे, जिससे उनकी कंपनियों को दूसरे देशों में इन्वेस्टमेंट करना आसान होगा और उनका आर्थिक प्रभाव बढ़ेगा। यूरोपियन यूनियन और कई विकसित देश भी इसे 'ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस' को बढ़ाने वाला मानते हैं। हालांकि, भारत का तर्क इन देशों के तर्क से अलग है। वर्तमान में एशिया और अफ्रीका से लेकर लैटिन अमेरिका तक के देश इसके फेवर में हैं, जो इसे इन्वेस्टमेंट आकर्षित करने और आर्थिक विकास बढ़ाने का अवसर मानते हैं।
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क्या है IFD?
IFD (Investment Facilitation for Development) एक प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिसे World Trade Organization (WTO) के तहत आगे बढ़ाया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य देशों के बीच विदेशी निवेश (FDI) को आसान और अधिक पारदर्शी बनाना है।
सरल शब्दों में कहें तो IFD यह सुनिश्चित करना चाहता है कि अगर कोई विदेशी कंपनी किसी देश में निवेश करना चाहती है, तो उसे जटिल नियमों, देरी और अनिश्चितता का सामना न करना पड़े। इसके तहत सरकारों को अपने निवेश से जुड़े कानून और प्रक्रियाएं स्पष्ट रूप से सार्वजनिक करनी होंगी, मंजूरी देने की प्रक्रिया को तेज और समयबद्ध बनाना होगा, और निवेशकों के लिए ‘सिंगल-विंडो सिस्टम’ जैसी सुविधाएं विकसित करनी होंगी।
महत्वपूर्ण बात यह है कि IFD इन्वेस्टमेंट के प्रोटेक्शन की या इन्वेस्टमेंट से जुड़े विवाद के समाधान जैसे मुद्दों पर बात नहीं करता, बल्कि केवल इन्वेस्टमेंट को सुगम बनाने (facilitation) पर केंद्रित है।
क्या हैं भारत के तर्क
हालांकि, भारत इसके विरोध में है। सबसे पहला और महत्वपूर्ण कारण पॉलिसी बनाने की स्वतंत्रता को लेकर है। भारत का मानना है कि अगर IFD जैसे समझौते WTO के प्रावधानों के तहत बाध्यकारी बना दिए जाएंगे तो सरकारों को अपने इन्वेस्टमेंट से जुड़े नियम अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार ढालने पड़ेंगे। इससे भविष्य में भारत के लिए अपनी घरेलू प्राथमिकताओं, जैसे स्थानीय उद्योग को बढ़ावा देना, मेक इन इंडिया जैसे कार्यक्रम लागू करना या रणनीतिक क्षेत्रों में विदेशी इन्वेस्टमेंट को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है। भारत को यह भी आशंका है कि आज जो समझौता केवल 'सुविधा' तक सीमित है, वह कल इन्वेस्टमेंट सुरक्षा और विवाद समाधान जैसे कठोर प्रावधानों तक फैल सकता है, जिससे नीति की स्वतंत्रता और सीमित हो जाएगी।
WTO के तहत लाने पर आपत्ति
दूसरा बड़ा कारण WTO के अधिकार क्षेत्र से जुड़ा है। भारत का तर्क है कि WTO एक वैश्विक ट्रेड से जुडी संस्था है, जिसका काम वस्तुओं और सेवाओं के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नियंत्रित करना है, न कि इन्वेस्टमेंट को। IFD जैसे समझौते को WTO के तहत लाना संस्था के मूल स्वरूप को बदलने जैसा है। भारत का मानना है कि इसकी वजह से WTO धीरे-धीरे अपने निर्धारित कार्यक्षेत्र से बाहर जा रहा है। अगर इस प्रवृत्ति को स्वीकार कर लिया गया, तो भविष्य में और भी गैर-व्यापारिक मुद्दों को WTO में शामिल किया जा सकता है, जिससे डब्ल्यूटीओ की संरचना और उद्देश्य दोनों बदल सकते हैं।
सभी की सहमति पर आधारित नहीं
तीसरा महत्वपूर्ण पहलू है plurilateral approach, जिसके तहत IFD को आगे बढ़ाया जा रहा है। यानी कि सभी देशों की सहमति के बजाय कुछ देशों के ग्रुप द्वारा ज्वाइंट स्टेटमेंट इनीशिएटिव के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। जिसका मतलब है कि इसमें सभी देशों की सहमति आवश्यक नहीं है। भारत का मानना है कि यह तरीका WTO की लोकतांत्रिक प्रकृति को कमजोर करता है और भविष्य में वैश्विक नियम बनाने की प्रक्रिया को कुछ देशों तक सीमित कर सकता है।
घरेलू उद्योग को लेकर चिंता
आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो भारत का विरोध उसके विकास मॉडल और रणनीतिक प्राथमिकताओं से भी जुड़ा हुआ है। भारत पूरी तरह फ्री इन्वेस्टमेंट रिजीम पर निर्भर नहीं रहना चाहता, बल्कि वह एक संतुलित मॉडल अपनाता है जिसमें घरेलू उद्योग, MSMEs और रोजगार सृजन को प्राथमिकता दी जाती है। IFD के तहत नियमों को सरल और एक जैसा बनाने का दबाव भारत की इन नीतियों को कमजोर कर सकता है। उदाहरण के तौर पर, अगर भारत किसी सेक्टर में स्थानीय कंपनियों को प्राथमिकता देना चाहता है या विदेशी इन्वेस्टमेंट पर कुछ शर्तें लगाना चाहता है, तो IFD के नियम उसके लिए बाधा बन सकते हैं।
द्विपक्षीय संबंधों को तरजीह
इसके साथ ही, भारत इन्वेस्टमेंट से जुड़े मुद्दों को द्विपक्षीय समझौतों (Bilateral Investment Treaties - BITs) और घरेलू कानूनों के माध्यम से नियंत्रित करना ज्यादा उपयुक्त मानता है। द्विपक्षीय समझौतों में देशों को अपने हितों के अनुसार शर्तें तय करने की अधिक स्वतंत्रता मिलती है, जबकि WTO जैसे बहुपक्षीय मंच पर 'वन-साइज-फिट्स-ऑल' यानी कि प्राथमिकता और परिस्थिति को नजरअंदाज करते हुए सबके लिए एक जैसा नियम लागू होने का खतरा रहता है। भारत के पिछले अनुभव, खासकर पुराने BITs के तहत हुए इन्वेस्टमेंट विवादों ने उसे इस मामले में अधिक सतर्क बना दिया है।
चीन चिंता का विषय
राजनीतिक और भू-रणनीतिक स्तर पर भी भारत का विरोध महत्वपूर्ण है। IFD को समर्थन देने वाले देशों में चीन और यूरोपियन यूनियन जैसे बड़े आर्थिक खिलाड़ी शामिल हैं। भारत को आशंका है कि ऐसे समझौतों के जरिए वैश्विक इन्वेस्टमेंट नियमों को इस तरह ढाला जा सकता है, जो बड़े देशों और उनके निवेशकों के हितों के अनुरूप हों। इससे छोटे और विकासशील देशों की बारगेनिंग पावर (bargaining power) कमजोर हो सकती है। विशेष रूप से चीन के संदर्भ में, भारत इसे केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक प्रतिस्पर्द्धा के रूप में भी देखता है, जहां इन्वेस्टमेंट के नियमों के जरिए वैश्विक प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
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विकास मॉडल लचीला होना चाहिए
भारत का एक और महत्वपूर्ण तर्क यह है कि वह खुद को Global South की आवाज के रूप में देखता है। भारत का मानना है कि सभी विकासशील देशों की परिस्थितियां और जरूरतें अलग-अलग हैं, इसलिए उन पर एक समान वैश्विक नियम थोपना उचित नहीं होगा। IFD जैसे समझौते, भले ही विकास के नाम पर लाए जा रहे हों, लेकिन वे सभी देशों के लिए समान रूप से लाभकारी नहीं हो सकते। इसलिए भारत इस बात पर जोर देता है कि विकास का मॉडल लचीला (flexible) होना चाहिए, न कि एक जैसा और बाध्यकारी।
देखा जाए तो भारत की 'न' केवल एक समझौते का विरोध नहीं है, बल्कि यह वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में संतुलन बनाए रखने की कोशिश भी है। यह एक ऐसा रुख है जो विकास और इन्वेस्टमेंट को पूरी तरह खारिज नहीं करता, बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहता है कि ये प्रक्रियाएं देशों की नीतिगत स्वतंत्रता और आर्थिक संप्रभुता को कमजोर किए बिना आगे बढ़ें। भारत का मानना है कि विकास होना जरूरी है लेकिन देश के हितों और परिस्थितियों के अनुरूप।
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