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मेलबर्न टेस्ट 1977: जब चंद्रशेखर की फिरकी में फंसकर ऑस्ट्रेलिया ने घुटने टेक दिए

भारतीय लेग स्पिनर भागवत चंद्रशेखर ने टेस्ट क्रिकेट में अपना बेस्ट बॉलिंग फिगर मेलबर्न में हासिल किया था। उन्होंने 104 रन देकर 12 विकेट झटक ऑस्ट्रेलिया को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था।

India vs Australia 1977 Melbourne Test

जब चंद्रशेखर की फिरकी में फंसा ऑस्ट्रेलिया, Photo Credit: Khabargaon

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मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड पर वह सुबह बाकी दिनों से कुछ अलग थी। ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर आई भारतीय टीम 5 टेस्ट मैचों के शुरुआती 2 टेस्ट गंवा चुकी था। ब्रिस्बेन में 16 रन की हार और पर्थ में दो विकेट की शिकस्त ने टीम इंडिया को अंदर तक झकझोर दिया था। जीत के करीब आकर दो बार चूकने से टीम का आत्मविश्वास टूट चुका था। ऑस्ट्रेलिया 2-0 से आगे था और सीरीज कब्जाने से एक जीत दूर था। ऐसे में 30 दिसंबर 1977 को मेलबर्न में शुरू हुआ तीसरा टेस्ट भारत के लिए सिर्फ एक और मुकाबला नहीं था।

 

यह उस टीम के लिए अपने अस्तित्व का सवाल था, जो ऑस्ट्रेलिया की तेज पिचों और तेज गेंदबाजों के सामने लगातार परीक्षा दे रही थी। कप्तान थे बिशन सिंह बेदी। सामने ऑस्ट्रेलिया की मजबूत टीम थी, जिसमें जेफ थॉमसन जैसे तूफानी गेंदबाज थे। भारत के पास क्या था? भरोसा। सुनील गावस्कर की तकनीक, गुंडप्पा विश्वनाथ की कलात्मक बल्लेबाजी, मोहिंदर अमरनाथ की जिद और भागवत चंद्रशेखर की रहस्यमयी लेग स्पिन से अभी भी उम्मीदें कायम थीं। मगर उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि अगले 5 दिन मेलबर्न में भारतीय क्रिकेट की एक ऐसी कहानी लिखी जाएगी, जिसे सालों बाद भी याद किया जाएगा।

 

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शुरुआत रही खराब

भारत ने टॉस जीता और बल्लेबाजी का फैसला किया लेकिन शुरुआत किसी डरावने सपने जैसी रही। सुनील गावस्कर और चेतन चौहान दोनों ओपनर्स बिना खाता खोले पवेलियन लौट गए। जेफ थॉमसन और वेन क्लार्क ने स्कोर 0 रन पर 2 विकेट कर दिए थे। इस मुश्किल समय में मोहिंदर अमरनाथ और गुंडप्पा विश्वनाथ ने क्रीज पर पांव जमाया और दोनों ने पारी संभालने की कोशिश की। दोनों ने तीसरे विकेट के लिए 105 रन जोड़े। 

 

विश्वनाथ 59 रन बनाकर आउट हुए। अमरनाथ ने 72 रन की धैर्यपूर्ण पारी खेली। दिलीप वेंगसरकर ने भी 37 रन जोड़े। अशोक मांकड़ ने 44, जबकि सैयद किरमानी ने 29 रन बनाए, जिससे भारत किसी तरह 256 तक पहुंचा। यह बहुत बड़ा स्कोर नहीं था। ऑस्ट्रेलियाई जमीन पर तो बिल्कुल नहीं लेकिन भारतीय गेंदबाजों के मन में शायद कुछ और ही था।

 

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चंद्रशेखर का जादू

ऑस्ट्रेलिया की पहली पारी शुरू हुई। करसन घावरी ने जॉन डायसन (0) और डेविड ओजिल्वी (6) के विकेट लेकर उसकी शुरुआत खराब कर दी। हालांकि इसके बाद गैरी कोजियर और क्रेंग सर्जेंट ने पारी संभाल ली। दोनों ने भारत के गेंदबाजों के सामने मुश्किलें पैदा कीं। एक समय ऑस्ट्रेलिया 122 रन तक पहुंच चुका था। तभी गेंद भागवत चंद्रशेखर के हाथों में आई।

चंद्रशेखर उन गेंदबाजों में से थे, जिनकी गेंद को समझना बल्लेबाजों के लिए अक्सर पहेली बन जाता था। उनका रन-अप, उनका ऐक्शन और गेंद का अचानक बदलता रुख, सब कुछ बल्लेबाज को असहज कर देता था। मेलबर्न में उन्होंने वही किया।

 

चंद्रशेखर ने कोजियर (67) को आउट कर खतरनाक हो चुकी साझेदारी को तोड़ा। फिर उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई कप्तान बॉब सिम्पसन (2) को सस्ते में निपटाया। दूसरे छोर से भारतीय कप्तान बिशन सिंह बेदी ने भी मोर्चा संभाला और पीटर टूही (14) और टोनी मान (11) के विकेट लेकर ऑस्ट्रेलिया का स्कोर 178/6 कर दिया। सर्जेंट (85) एक छोर पर टिके थे लेकिन चंद्रशेखर ने उन्हें जल्दी आउट कर ऑस्ट्रेलिया का पुलिंदा बांध दिया। इसके बाद ऑस्ट्रेलियाई पारी तेजी से ढह गई। चंद्रशेखर ने सिर्फ 52 रन देकर 6 विकेट झटके। बिशन बेदी के नाम 2 विकेट रहा और ऑस्ट्रेलिया 213 रन पर सिमट गया। भारत को 43 रन की बढ़त मिली। इस छोटी सी बढ़त ने भारतीय टीम की उम्मीदें जगाईं।

 

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गावस्कर ने गाड़ा खूंटा

दूसरी पारी में भारत की शुरुआत पहली पारी से बेहतर रही। चेतन चौहान ने 20 रन बनाए और फिर सुनील गावस्कर ने मोर्चा संभाल लिया। गावस्कर उस दौरे पर अलग ही लय में थे। ऑस्ट्रेलिया की तेज गेंदबाजी के सामने वह बल्ले को ऐसे चला रहे थे, जैसे हर गेंद का जवाब उनके पास पहले से मौजूद हो। मेलबर्न में उन्होंने 118 रन बनाए। 285 गेंदों का सामना किया और करीब 6 घंटे क्रीज पर बिताए। यह सिर्फ एक शतक नहीं था। यह उस टीम के लिए भरोसे की दीवार थी, जिसे शुरुआती दो टेस्ट हारने के बाद किसी ऐसे ही सहारे की जरूरत थी।

 

गावस्कर के साथ विश्वनाथ ने 54 और अमरनाथ ने 41 रन बनाए। भारत ने दूसरी पारी में 343 रन बनाए और ऑस्ट्रेलिया के सामने 387 रन का लक्ष्य रखा। अब कहानी पूरी तरह बदल चुकी थी। पहली पारी में 43 रन की बढ़त लेने वाली टीम इंडिया ऑस्ट्रेलिया में जीत से 10 विकेट दूर थी।

 

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चंद्रशेखर के सामने ऑस्ट्रेलिया ने टेके घुटने

मुकाबले के चौथे दिन ऑस्ट्रेलिया की दूसरी पारी शुरू हुई। पिच टूट चुकी थी। गेंद तेजी से घूम रही थी। ऐसे में उसके लिए 387 रन तक पहुंचना पहाड़ समान था। डायसन और कोजियर ने 42 रन की ओपनिंग साझेदारी कर सबको चौंका दिया। हालांकि इसके बाद असली खेल शुरू हुआ। बिशन सिंह बेदी ने इसी स्कोर पर उसे दो झटके दे दिए। डायसन 12 रन बनाकर आउट हुए, जबकि ओजिल्वी खाता भी नहीं खोल सके। यहां से चंद्रशेखर का कहर शुरू हुआ। वह एक के बाद एक ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों को निपटाते चले गए। देखते ही देखते चौथे दिन स्टंप्स तक कंगारू टीम का स्कोर 122/8 हो गया। कोजियर 34 रन बनाकर पवेलियन लौटे। सर्जेंट ने सिर्फ 17 रन बनाए। सिम्पसन 4 रन ही बना सके। चंद्रशेखर दूसरी पारी में भी 6 विकेट ले चुके थे।

 

अब आखिरी दिन महज औपचारिकताएं बची थीं। बिशन सिंह बेदी ने पांचवें दिन ऑस्ट्रेलिया के बाकी बचे 2 विकेट लिए और भारत की जीत पर मुहर लगा दी। MCG में जब ऑस्ट्रेलिया का आखिरी विकेट गिरा, तब भारतीय खिलाड़ियों का जश्न देखने लायक था। यह सिर्फ एक जीत नहीं थी। भारतीय क्रिकेट के लिए यह एक लंबे इंतजार का अंत था। ऑस्ट्रेलिया की जमीन पर भारत ने पहली बार कोई टेस्ट मैच जीता। वह भी 222 रन के बड़े अंतर से। चंद्रशेखर ने मुकाबले में कुल 12 विकेट झटके। यह टेस्ट क्रिकेट में उनका बेस्ट बॉलिंग रहा। बेदी ने भी उनका भरपूर साथ देते हुए 6 विकेट निकाले।

 

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मेलबर्न की जीत ने किया टॉनिक का काम

मेलबर्न की जीत ने सीरीज को खत्म नहीं किया था। ऑस्ट्रेलिया अभी भी 2-1 से आगे था लेकिन भारत ने अपने भीतर बैठे उस डर को हरा दिया था, जो विदेशी जमीन पर बड़ी टीमों के सामने अक्सर सिर उठाता है।

 

इसके बाद सिडनी में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को पारी और 2 रन से हराकर सीरीज 2-2 से बराबर कर दी। हालांकि एडिलेड में आखिरी टेस्ट 47 रन से जीत ऑस्ट्रेलिया ने सीरीज 3-2 से अपने नाम की। फिर भी मेलबर्न की वह जीत अलग थी। क्योंकि कभी-कभी किसी सीरीज का नतीजा पूरी कहानी नहीं बताता। कुछ मैच ऐसे होते हैं, जो हारने वाली टीम की जीत से ज्यादा उसके जज्बे के बारे में बताते हैं। मेलबर्न 1977 ऐसा ही टेस्ट था।


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