उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में भ्रूण के लिंग परीक्षण और गर्भपात का सनसनीखेज मामला सामने आया है। आरोप है कि चार माह की गर्भवती को गर्भ में लड़की होने की बात बताकर गर्भपात की गोली खिला दी गई। गोली खाने के बाद गर्भ गिरा तो पता चला कि भ्रूण लड़के का था। शिकायत पर पुलिस ने आशा बहू को गर्भपात की चार गोलियों के साथ गिरफ्तार कर लिया है। महिला डॉक्टर के खिलाफ भी रिपोर्ट दर्ज की गई है।
मामला महुआखेड़ा थाना क्षेत्र का है। हायरस जिले के सासनी थाना क्षेत्र के गांव निनामई निवासी मनोज कुमार ने पुलिस को दी तहरीर में बताया कि उसकी पत्नी करीब चार माह की गर्भवती थी। आरोप है कि धनिपुर मंडी की रहने वाली आशा कार्यकर्ता कमलेश शर्मा उसके संपर्क में आई और गर्भ में पल रहे बच्चे की जांच कराने की बात कही।आरोप है कि कमलेश शर्मा उसकी पत्नी को रामघाट रोड स्थित कैसी सिंघल हॉस्पिटल लेकर गई। वहां डॉ. सविता सिंघल ने अल्ट्रासाउंड किया और गर्भ में लड़की होने की जानकारी दी। इसके बाद आशा बहू ने प्रभाव डालकर गर्भपात की गोली दिलवाई।
गोली खाने के बाद बिगड़ी हालत
पीड़ित पति के अनुसार 26 अगस्त 2026 को उसकी पत्नी को गर्भपात की गोली दी गई। 2 सितंबर 2026 को गोली खाने के बाद उसकी तबीयत काफी बिगड़ गई। गंभीर परेशानी के बाद करीब चार महीने का गर्भ गिर गया। बाद में पता चला कि गर्भ में पल रहा भ्रूण वास्तव में लड़के का था।मनोज ने पूरे मामले की शिकायत पुलिस से की। उसकी तहरीर के आधार पर आशा बहू कमलेश शर्मा और डॉ. सविता सिंघल के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है।
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पुलिस ने कार्रवाई करते हुए आशा बहू कमलेश शर्मा को गर्भपात की चार गोलियों के साथ गिरफ्तार किया है। पुलिस अब मामले में अस्पताल की भूमिका और गर्भ के लिंग की जानकारी दिए जाने समेत अन्य पहलुओं की जांच कर रही है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. आरएन सिंह ने बताया कि कैसी सिंघल हॉस्पिटल के पूरे मामले की गहनता से जांच कराई जाएगी। पूरे प्रकरण की जांच के बाद विभागीय नियमों के अनुसार अस्पताल पर भी कार्रवाई की जाएगी।
10 साल पहले भी सील हो चुका है अस्पताल
मामले में यह तथ्य भी सामने आया है कि रामघाट रोड स्थित कैसी सिंघल हॉस्पिटल करीब 10 साल पहले भी लिंग परीक्षण के मामले में सील हो चुका है। उस समय तत्कालीन पीसीपीएनडीटी अधिनियम के नोडल अधिकारी डॉ. राहुल कौशलेन्द्र के साथ स्थानीय स्वास्थ्य विभाग की टीम और हरियाणा से आई टीम ने अस्पताल में छापा मारा था। छापे के दौरान भ्रूण का लिंग परीक्षण करते हुए रंगे हाथ पकड़े जाने की बात सामने आई थी। इसके बाद अस्पताल को सील कर दिया गया था। अस्पताल संचालक के पिता जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में पूर्व चिकित्सक रहे हैं, जबकि उनके एक रिश्तेदार आगरा में अस्पताल संचालित करते हैं। करीब आठ वर्ष पहले हाईकोर्ट से राहत मिलने के बाद अस्पताल की सील खोली जा सकी थी।
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सीओ सर्वम सिंह के मुताबिक, पीड़ित पति की शिकायत पर आरोपियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई है। अस्पताल के रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों के आधार पर मामले की गहराई से जांच की जा रही है। पुलिस यह भी पता लगा रही है कि भ्रूण के लिंग की जानकारी कैसे मिली और गर्भपात की दवा किसके माध्यम से उपलब्ध कराई गई। अलीगढ़ के इस मामले ने एक बार फिर भ्रूण के लिंग परीक्षण और अवैध गर्भपात पर निगरानी व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच पूरी होने के बाद ही मामले में शामिल अन्य लोगों की भूमिका स्पष्ट होगी।