IPS संजीव गांधी पर क्यों हुई एक और FIR? SSP रहते एक और गड़बड़ी का आरोप
सरकारी फंड की निकासी में गड़बड़ी के आरोप में फंसे पूर्व एसएसपी संजीव गांधी एक और मामले में फंस गए हैं। 24 घंटे के भीतर गांधी पर दूसरी FIR हो गई है।

IPS संजीव गांधी, Photo Credit-Social Media
पुलिस जवानों के सरकारी आवासों और पुलिस भवनों की मरम्मत के लिए आवंटित बजट के इस्तेमाल को लेकर हिमाचल प्रदेश पुलिस में वित्तीय प्रबंधन और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पुलिस भवनों और कर्मचारियों के आवासों की मरम्मत के लिए निर्धारित धनराशि में कथित अनियमितताओं के मामले में वर्तमान डीआईजी एवं तत्कालीन एसएसपी शिमला संजीव कुमार गांधी के खिलाफ एक और एफआईआर दर्ज की गई है।
ऑडिट समिति की रिपोर्ट के आधार पर मामला दर्ज
पुलिस मुख्यालय की ओर से गठित ऑडिट समिति की रिपोर्ट के आधार पर यह मामला दर्ज हुआ है। आरोपों के केंद्र में करीब 1.28 करोड़ रुपये के बजट का इस्तेमाल है। ऑडिट में तत्कालीन एसएसपी के शिमला स्थित सरकारी आवास 'साउथवुड' पर 14,07,392 रुपये खर्च किए जाने का उल्लेख है।
रिपोर्ट के मुताबिक इस आवास की मरम्मत के लिए अलग से बजट स्वीकृत होने और सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति से संबंधित आवश्यक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं मिले। मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि ऑडिट में रामपुर और शोघी के लिए निर्धारित धनराशि के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए गए हैं। ये वे स्थान हैं, जहां पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों की सुविधाओं के लिए मरम्मत कार्य प्रस्तावित थे।
जिस आवास पर खर्च दिखाया, उसके लिए अलग बजट मंजूर नहीं
ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2022-23 से 2024-25 के दौरान पुलिस भवनों और जवानों के सरकारी आवासों की मरम्मत एवं रखरखाव के लिए आवंटित करीब 1.28 करोड़ रुपये के खर्च की पड़ताल की गई। इसमें 14,07,392 रुपये तत्कालीन एसएसपी संजीव गांधी के सरकारी आवास साउथवुड पर खर्च किए जाने दर्शाए गए हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि आवास की मरम्मत के लिए न तो सरकार और न ही पुलिस मुख्यालय की ओर से अलग बजट स्वीकृत किया गया था। संबंधित कार्य मूल प्रस्तावों में भी शामिल नहीं थे। इसके अतिरिक्त, सक्षम प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति और आवश्यक अनुमोदनों से जुड़े दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं मिले।
ऑडिट में सामने आए इन तथ्यों के बाद अब यह जांच का विषय है कि संबंधित कार्यों को किस प्रक्रिया के तहत मंजूरी दी गई, खर्च किस आधार पर किया गया और वित्तीय नियमों का पालन हुआ या नहीं।
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रामपुर और शोघी के बजट पर भी सवाल
ऑडिट समिति ने केवल एसएसपी आवास पर हुए खर्च को ही नहीं, बल्कि दूसरे स्थानों के लिए निर्धारित बजट के इस्तेमाल को लेकर भी आपत्तियां दर्ज की हैं।
रामपुर: रिपोर्ट के अनुसार, रामपुर में एसडीपीओ आवास की मरम्मत के लिए स्वीकृत 2.80 लाख रुपये भी तत्कालीन एसएसपी के शिमला स्थित सरकारी आवास पर खर्च दर्शाए गए।
शोघी: शोघी पुलिस बैरियर की गुमटी की मरम्मत के लिए निर्धारित 2.50 लाख रुपये की राशि भी एसएसपी आवास पर खर्च दिखाई गई। ऑडिट के अनुसार, इस राशि को फरवरी 2023 में कार्य पूरा होने के आधार पर वापस प्राप्त किया गया था, लेकिन शोघी में मरम्मत कार्य पूरा होने के प्रमाण नहीं मिले।
अन्य खर्च: वर्ष 2023-24 में 1.62 लाख रुपये और 2024-25 में 7.22 लाख रुपये भी सरकारी आवास पर खर्च दर्शाए जाने का उल्लेख है। इन कार्यों के लिए जरूरी पूर्व स्वीकृतियों और जिला स्तरीय समिति की अनुशंसा के दस्तावेज उपलब्ध नहीं पाए गए। इन तथ्यों की जांच के दौरान संबंधित रिकॉर्ड और भुगतान प्रक्रिया की पड़ताल महत्वपूर्ण होगी।
शोघी पुलिस पोस्ट कंटेनर में, मरम्मत बजट के इस्तेमाल पर सवाल
इस मामले का एक अहम पहलू पुलिसकर्मियों की कार्य परिस्थितियों से जुड़ा है। पुलिस की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, शोघी पुलिस पोस्ट आज भी एक कंटेनर में संचालित हो रही है। ऐसे में पुलिसकर्मियों की बुनियादी सुविधाओं और कार्यस्थल की मरम्मत के लिए निर्धारित बजट के इस्तेमाल पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
एक तरफ पुलिस कर्मियों के आवासों और कार्यस्थलों की मरम्मत की जरूरत है, दूसरी ओर ऑडिट में ऐसे खर्च सामने आए हैं, जिन्हें लेकर स्वीकृति और बजट आवंटन के दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि, ऑडिट में दर्ज आपत्तियों और खर्च के वास्तविक स्वरूप के बीच अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकाला जा सकेगा।
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2025-26 के प्रस्तावित कार्यों में भी मिली गड़बड़ी
ऑडिट समिति ने वित्त वर्ष 2025-26 के कार्यों की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 28.67 लाख रुपये के बजट के तहत 50 कार्य प्रस्तावित थे। इनमें से 22 कार्य किए जाने का रिकॉर्ड मिला, लेकिन इन 22 कार्यों में 13 ऐसे थे, जो मूल स्वीकृत प्रस्ताव से बाहर थे।
ऑडिट समिति ने स्वीकृत प्रस्तावों से अलग कार्यों पर धनराशि खर्च किए जाने की प्रक्रिया पर आपत्ति दर्ज की है। यह बिंदु सरकारी विभागों में बजट स्वीकृति, कार्यों के चयन और खर्च की निगरानी व्यवस्था को लेकर भी सवाल खड़े करता है।
दो दिन में दो एफआईआर, पहले भी लगे थे वित्तीय अनियमितताओं के आरोप
संजीव गांधी के खिलाफ यह दूसरी एफआईआर है, जो लगातार दो दिनों में दर्ज हुई हैं। इससे पहले 22 अक्तूबर को एक पुलिस कांस्टेबल की शिकायत पर उनके खिलाफ कथित धोखाधड़ी, जालसाजी और सरकारी धन के दुरुपयोग से जुड़ा मामला दर्ज किया गया था। उस मामले में पुलिस लाइन कैथू में तैनात कांस्टेबल की ओर से आरोप लगाया गया था कि वर्ष 2024 और 2025 में सरकारी व्यवस्थाओं के लिए उन्होंने अपनी जेब से 1,87,890 रुपये खर्च किए, लेकिन स्वीकृति के बावजूद उन्हें भुगतान नहीं मिला।
पहले मामले में करीब 2.35 लाख रुपये की कथित अनियमित निकासी का भी उल्लेख किया गया था। अब दूसरे मामले में पुलिस भवनों और कर्मचारियों के आवासों की मरम्मत के लिए निर्धारित बजट के इस्तेमाल की जांच शुरू हुई है। दोनों एफआईआर अलग-अलग मामलों और आरोपों से संबंधित हैं। इन्हें एक ही वित्तीय प्रकरण मानना उचित नहीं होगा।
संजीव गांधी ने आरोपों को बताया था 'विच हंट'
संजीव गांधी ने अपने खिलाफ दर्ज मामलों के आरोपों को खारिज करते हुए कार्रवाई को 'विच हंट' यानी निशाना बनाकर की जा रही कार्रवाई बताया है। उन्होंने कहा है कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया और कथित अनियमितताओं के खिलाफ आवाज उठाने के कारण उन्हें दबाव में लाने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में जांच के दौरान उनके पक्ष, संबंधित अधिकारियों की भूमिका, बजट स्वीकृति के रिकॉर्ड और भुगतान से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल अहम होगी।
अब जांच के केंद्र में क्या?
- दूसरी एफआईआर के बाद जांच में कई बिंदुओं पर स्पष्टता जरूरी होगी।
- साउथवुड आवास पर मरम्मत के नाम पर हुए खर्च को किस स्तर पर स्वीकृति मिली?
- रामपुर और शोघी के लिए निर्धारित धनराशि का इस्तेमाल किस प्रक्रिया के तहत किया गया?
- जिन कार्यों को पूरा बताया गया, उनके भौतिक सत्यापन और भुगतान संबंधी रिकॉर्ड क्या हैं?
- मूल प्रस्तावों से बाहर किए गए कार्यों के लिए किसने अनुमति दी?
- बजट आवंटन, खर्च और ऑडिट निगरानी की प्रक्रिया में किन अधिकारियों और कर्मचारियों की क्या भूमिका रही?
पुलिस के अनुसार, 22 अक्तूबर को शिमला थाने में एफआईआर संख्या 139/2026 भारतीय न्याय संहिता की धारा 316(5) के तहत दर्ज की गई है। मामले की जांच जारी है।
सरकारी धन के इस्तेमाल में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना किसी भी विभाग की जिम्मेदारी है। खासकर पुलिसकर्मियों के आवासों और कार्यस्थलों जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए निर्धारित राशि के उपयोग में नियमों का पालन जरूरी है। अब जांच से स्पष्ट होगा कि ऑडिट में सामने आई अनियमितताओं के लिए जिम्मेदारी किसकी बनती है और सरकारी धन के इस्तेमाल में वास्तव में क्या गड़बड़ी हुई।
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