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नमाज पढ़ने से रोका, बारात नहीं आने दी, भाई के फरमान से खौफ में जी रहा परिवार

बिहार में कथित तौर पर एक भाई ने अपने ही भाई के खिलाफ ऐसा फरमान जारी कर दिया जिससे उसका जीना मुश्किल हो गया।

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प्रतीकात्मक तस्वीर । Photo Credit: AI Generated

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संजय सिंह, पटना। बिहार के पटना जिले के चंद्रमंडीह थाना क्षेत्र अंतर्गत घोरमारा गांव इन दिनों एक अजीबोगरीब सामाजिक संकट से गुजर रहा है, जहां कथित तौर पर एक फरमान की वजह से एक ही परिवार के 14 लोग पिछले दो वर्षों से डर और परेशानी के साये में जी रहे हैं। मामला सौतेले भाइयों तैयब अंसारी और एहसान अली के बीच जमीन विवाद से शुरू हुआ लेकिन अब यह पूरे गांव के सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित कर रहा है।

 

ग्रामीणों के अनुसार, तैयब अंसारी गांव में बनी एक कमेटी के अध्यक्ष हैं, जिसे आपातकालीन आर्थिक मदद के लिए गठित किया गया था। आरोप है कि इसी पद के प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए तैयब अंसारी ने गांव में अपनी सरदारी कायम कर ली है और अपने सौतेले भाई एहसान अली के परिवार के खिलाफ सामाजिक बहिष्कार का फरमान जारी करवा दिया है।

 

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मस्जिद में नमाज अदा करने से रोका

इस कथित फरमान का असर बेहद गंभीर है। पीड़ित परिवार को न केवल सामाजिक रूप से अलग-थलग कर दिया गया है, बल्कि उनके दैनिक जीवन पर भी इसका गहरा असर पड़ा है। एहसान अली का कहना है कि उनके परिवार को गांव की मस्जिद में नमाज अदा करने से रोका गया, कब्रिस्तान जाने पर पाबंदी लगा दी गई और यहां तक कि गांव के दुकानदारों को भी उनके परिवार को राशन या अन्य जरूरी सामान देने से मना कर दिया गया है।

बात न मानने पर जुर्माना

ग्रामीण तस्लीम अंसारी बताते हैं कि सरदार के आदेश का उल्लंघन करने वालों पर पांच हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जाता है और कई मामलों में हुक्का-पानी बंद कर सामाजिक बहिष्कार भी किया जाता है। उनके अनुसार, अब तक दो दर्जन से अधिक लोग इस तरह की कार्रवाई का सामना कर चुके हैं।

बारात आने पर भी लगा दी गई है रोक 

एहसान अली के परिवार की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी बेटी के निकाह के समय भी गांव में बारात आने पर रोक लगा दी गई थी। मजबूर होकर उन्हें दूसरे गांव में जाकर बेटी की शादी करनी पड़ी। एहसान का कहना है कि उनके परिवार पर तीन बार जुर्माना भी लगाया जा चुका है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और कमजोर हो गई है।

पंचायत की भूमिका पर सवाल

हालांकि, इस पूरे मामले में पंचायत की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। घुटवे पंचायत के मुखिया प्रतिनिधि परमानंद दास ने सामाजिक बहिष्कार की बात को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि लगभग छह महीने पहले पंचायत के हस्तक्षेप से दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया था, जिसमें 75 हजार रुपये के लेन-देन और जमीन बंटवारे का मुद्दा सुलझा लिया गया था। उनके अनुसार, अब लगाए जा रहे आरोप बेबुनियाद हैं।

सभी आरोपों को किया खारिज

वहीं, आरोपी तैयब अंसारी ने भी सभी आरोपों को निराधार बताया है। उनका कहना है कि कुछ लोग गांव की शांति भंग करने की कोशिश कर रहे हैं। जो भी निर्णय लिया गया है, वह समाज के लोगों की सहमति से लिया गया है, न कि किसी एक व्यक्ति के दबाव में। प्रशासनिक स्तर पर भी यह मामला अभी तक ठोस कार्रवाई की प्रतीक्षा में है।

एसपी को मामले की जानकारी नहीं

एसपी विश्वजीत दयाल ने कहा कि उन्हें इस मामले की कोई औपचारिक जानकारी या शिकायत नहीं मिली है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शिकायत मिलने के बाद ही मामले की जांच कर उचित कार्रवाई की जाएगी।

 

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घोरमारा गांव की यह कहानी सिर्फ एक पारिवारिक विवाद नहीं, बल्कि उस सामाजिक संरचना पर सवाल खड़े करती है, जहां कानून से ऊपर फरमान और सरदारी हावी हो जाती है। अब देखना यह है कि प्रशासन कब तक इस मामले में हस्तक्षेप करता है और पीड़ित परिवार को न्याय मिल पाता है या नहीं।

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