चौराहे पर सीटी बजाने से लेकर दुर्घटना में घायल को अस्पताल पहुंचाने तक, बिहार के ट्रैफिक पुलिसकर्मी अब पहले से ज्यादा तैयार हैं। राज्य सरकार ने यातायात प्रबंधन और सड़क सुरक्षा को मजबूत करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। परिवहन विभाग अब तक राज्यभर के 4909 ट्रैफिक पुलिसकर्मियों को विशेष प्रशिक्षण दे चुका है।
इस प्रशिक्षण का मकसद सिर्फ चालान काटना नहीं है बल्कि हादसे रोकना, नियमों का पालन कराना और दुर्घटना के बाद तुरंत मदद पहुंचाना है। परिवहन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि सड़क पर कानून को सबसे पहले यही लोग लागू कराते हैं। इसलिए इन्हें अपडेट रखना जरूरी है।
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14 दिन का आवासीय प्रशिक्षण
पहले यह प्रशिक्षण 6 दिन का होता था। 2019 में पुलिस मुख्यालय से अनुमति मिलने के बाद औरंगाबाद स्थित आईडीटीआर यानी इंस्टीट्यूट ऑफ ड्राइविंग एंड ट्रैफिक रिसर्च में यातायात पुलिसकर्मियों को निशुल्क आवासीय प्रशिक्षण दिया जाने लगा लेकिन 6 दिन में पूरी जानकारी देना मुश्किल था। इसलिए अब प्रशिक्षण की अवधि बढ़ाकर 14 दिन कर दी गई है।
इस 14 दिन के प्रशिक्षण में हर जिले से चुनकर 80 पुलिसकर्मियों का एक बैच बनाया जाता है। आवास, खाना और पढ़ाई सब आईडीटीआर परिसर में ही होता है। ताकि पुलिसकर्मी बिना किसी रुकावट के पूरा ध्यान प्रशिक्षण पर दे सकें।
हिट एंड रन से लेकर प्राथमिक उपचार तक की पढ़ाई
प्रशिक्षण में सिर्फ यातायात नियम ही नहीं बताए जा रहे बल्कि वे सभी जरूरी बातें सिखाई जा रही हैं जो सड़क पर ड्यूटी के दौरान काम आती हैं। इसमें हिट एंड रन मामलों की जांच कैसे की जाए इसकी पूरी प्रक्रिया बताई जाती है। ट्रैफिक मैनेजमेंट और रोड सेफ्टी प्रोटोकॉल की बारीकियां समझाई जाती हैं।
सबसे अहम हिस्सा है गुड सेमेरिटन लॉ यानी अच्छे समरिटन कानून की जानकारी। इसके तहत अगर कोई व्यक्ति सड़क दुर्घटना में घायल को मदद करता है तो उसे किसी कानूनी कार्रवाई का डर नहीं रहेगा। पुलिसकर्मियों को बताया जा रहा है कि वे दुर्घटना स्थल पर पहुंचकर घायल को तुरंत प्राथमिक उपचार कैसे दें और अस्पताल तक पहुंचाएं। कई बार कुछ मिनट की देरी से जान चली जाती है। ऐसे में ट्रैफिक पुलिस की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रशिक्षण के दौरान यातायात नियमों का सख्ती से पालन कराने के तरीके भी बताए जा रहे हैं। ओवरस्पीडिंग, बिना हेलमेट, शराब पीकर गाड़ी चलाना जैसे मामलों पर कैसे कार्रवाई हो इस पर भी फोकस है।
परीक्षा के बाद मिल रहा प्रमाण-पत्र
प्रशिक्षण के अंतिम दिन सभी पुलिसकर्मियों की परीक्षा ली जाती है। इसमें लिखित के साथ-साथ प्रैक्टिकल भी होता है। जो पुलिसकर्मी पास होते हैं उन्हें परिवहन विभाग की ओर से प्रमाण-पत्र दिया जाता है। अब तक 4909 पुलिसकर्मी इस प्रमाण-पत्र को ले चुके हैं। विभाग का लक्ष्य है कि धीरे-धीरे राज्य के सभी ट्रैफिक पुलिसकर्मी इस प्रशिक्षण से गुजरें। परिवहन सचिव राज कुमार का कहना है कि सड़क दुर्घटनाएं कम करना हमारी प्राथमिकता है।
इसके लिए सिर्फ कानून बनाना काफी नहीं है, उसे लागू करने वाले लोगों को भी सक्षम बनाना होगा। ट्रैफिक पुलिसकर्मी सड़कों पर कानून के सबसे महत्वपूर्ण अमलदार हैं। उन्हें नियमित रूप से अपडेटेड प्रशिक्षण देकर हम सड़क दुर्घटनाओं को कम करने और यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि गुड सेमेरिटन योजना के तहत पुलिसकर्मी दुर्घटना की स्थिति में मददगार की भूमिका निभा सकते हैं। अक्सर लोग घायल को देखकर रुकते नहीं हैं। डरते हैं कि पुलिस पूछताछ करेगी लेकिन अब पुलिसकर्मी खुद आगे आकर मदद करेंगे तो आम लोगों में भी हिम्मत आएगी।
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बिहार में सड़क सुरक्षा के प्रति संवेदनशीलता
विभाग का मकसद सिर्फ चालान और जाम हटाना नहीं है। बल्कि बिहार में सड़क सुरक्षा के प्रति एक नई संवेदनशीलता पैदा करना है। हर पुलिसकर्मी जब नियम बताएगा, हेलमेट के लिए समझाएगा, स्पीड के लिए रोकेगा और हादसे में तुरंत मदद करेगा तो लोगों का भरोसा भी बढ़ेगा। आईडीटीआर औरंगाबाद में मिल रही ट्रेनिंग में विशेषज्ञ डॉक्टर, कानूनी सलाहकार और यातायात विशेषज्ञ भी लेक्चर ले रहे हैं। उन्हें बताया जा रहा है कि दुर्घटना के बाद घटनास्थल को कैसे सुरक्षित रखा जाए, सबूत कैसे बचाए जाएं और पीड़ित परिवार से कैसे बात की जाए। परिवहन विभाग का कहना है कि यह अभियान लगातार जारी रहेगा। हर महीने नए बैच प्रशिक्षण के लिए औरंगाबाद भेजे जा रहे हैं। आने वाले समय में ग्रामीण क्षेत्रों में तैनात पुलिसकर्मियों को भी इस प्रशिक्षण में शामिल किया जाएगा।