महाराष्ट्र के मुंबई में बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक बहुत बड़ा फैसला सुनाते हुए मुंबई पुलिस के उस आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिसके तहत चार लोगों को शहर से बाहर निकाल दिया गया था। अदालत ने इस मामले में गहरी नाराजगी जताई और पुलिस से पूछा कि क्या इस तरह की मनमानी कार्रवाई करके सरकार नागरिकों को अपना गुलाम बना रही है? कोर्ट ने कहा कि इन लोगों के साथ ऐसा बर्ताव किया गया मानो वे कोई बहुत बड़े अपराधी हों जबकि वे सिर्फ अपनी लोकतांत्रिक आवाज उठा रहे थे।
इस मामले में जिन चार लोगों को निशाना बनाया गया था उनके नाम सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी, अकबर हुसैन सैयद, मोहम्मद रफीक गुलाम रसूल अंसारी और फिरोज अब्दुल वहाब खान हैं। सईद अहमद चौधरी 51 साल के हैं और ट्रांसपोर्ट का काम करने के साथ-साथ एक राजनीतिक पार्टी से भी जुड़े हैं। वहीं अकबर हुसैन सैयद कूरियर डिलीवरी का काम संभालते हैं। ये सभी लोग आपस में रिश्तेदार नहीं हैं लेकिन ये सब एक ही राजनीतिक पार्टी 'सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया' से जुड़े हुए हैं। जब पुलिस ने इन्हें मुंबई से बाहर भगा दिया तो इन चारों को मजबूरी में ठाणे जिले के मुंब्रा इलाके में एक ही किराए का कमरा लेकर साथ रहना पड़ा था।
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कैसे की थी कार्रवाई?
मुंबई पुलिस ने इन चारों पर महाराष्ट्र पुलिस एक्ट के तहत यह सख्त कार्रवाई की थी। इस एक्ट के मुताबिक पुलिस किसी भी ऐसे व्यक्ति को अधिकतम दो साल के लिए शहर से बाहर कर सकती है जिस पर यह अंदेशा हो कि वह कोई अपराध कर सकता है। पुलिस ने इन पर शिकंजा कसने के लिए साल 2019 से लेकर 2025 के बीच दर्ज पुराने मामलों और पुरानी शिकायतों को आधार बनाया था। ये पुराने मामले सीएए और एनआरसी के खिलाफ हुए प्रदर्शनों, राम मंदिर, ज्ञानवापी मस्जिद विवाद, लाउडस्पीकर पर अजान और कुछ स्थानीय मुद्दों पर हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़े हुए थे।
शहर से बाहर निकाले जाने के कारण इन चारों लोगों और उनके परिवारों को मानसिक और आर्थिक परेशानी उठानी पड़ी। सईद अहमद चौधरी को करीब सात महीने तक मुंब्रा में किराए के कमरे में रहना पड़ा और उन पर गृह मंत्री तथा केंद्र सरकार के खिलाफ नारे लगाने का आरोप लगाया गया था। अकबर हुसैन सैयद चार महीने तक अपने परिवार से दूर रहे, बीएमसी का चुनाव नहीं लड़ पाए और परिवार की परेशानी के कारण उनकी मां की तबीयत बिगड़ गई। फिरोज अब्दुल वहाब खान अपने दूसरे बच्चे के जन्म के समय घर से दूर रहे। मोहम्मद रफीक गुलाम रसूल अंसारी अपनी 68 साल की मां से महीनों तक नहीं मिल पाए थे।
अदालत की कड़ी बातें
इस मामले की सुनवाई जस्टिस माधव जामदार ने की और पुलिस से सवाल किया कि जो कानून अपराधियों के लिए है, उसका इस्तेमाल सरकार की नीतियों के खिलाफ बोलने वाले आम नागरिकों पर क्यों किया जा रहा है। अदालत ने कहा कि बिना इजाजत प्रदर्शन करने पर सिर्फ एक महीने की सजा का नियम है, न कि पूरे शहर से बाहर निकालने का। अदालत ने यह भी याद दिलाया कि पुलिस अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल करके लोगों की आवाज नहीं दबा सकती।
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चुनाव से जुड़ा कनेक्शन
राज्य सरकार ने कोर्ट में कहा कि इन लोगों ने बिना इजाजत प्रदर्शन किए थे और ऐसी पार्टी से जुड़े हैं जिसका पिछला इतिहास ठीक नहीं है। जज ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि पुलिस ने पहले नोटिस में ऐसी कोई बात नहीं कही थी। अब इस नए आधार को नहीं माना जा सकता। इन लोगों ने कोर्ट को बताया कि पुलिस ने यह आदेश जनवरी 2026 में होने वाले बीएमसी चुनाव से ठीक पहले दिया था ताकि वे चुनाव से बाहर हो जाएं और अपनी बात न रख सकें।