बॉम्बे हाई कोर्ट ने मंगलवार को तर्कवादी नरेंद्र दाभोलकर की 2013 में हुई हत्या के मामले में दोषी सचिन अंदुरे को जमानत दे दी। जस्टिस सारंग कोतवाल और जस्टिस रंजीत सिन्हा भोंसले की डिवीजन बेंच ने आदेश सुनाया। साथ ही कोर्ट ने 2024 में सत्र अदालत द्वारा सचिन अंदुरे को सुनाई गई उम्रकैद की सजा पर भी रोक लगा दी। हालांकि, इसको लेकर विस्तृत आदेश की प्रति अभी उपलब्ध नहीं है।
कार्यकर्ता गोविंद पानसरे की हत्या के मामले में भी मुकदमे का सामना कर रहा सचिन अंदुरे अब जेल से बाहर आ सकता है, क्योंकि उसे दोनों मामलों में जमानत मिल गई है। महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक 67 वर्षीय नरेंद्र दाभोलकर की 20 अगस्त, 2013 को पुणे में सुबह की सैर के दौरान मोटरसाइकिल सवार दो हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी।
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सीबीआई ने की थी जांच
शुरुआत में इस मामले की जांच स्थानीय पुलिस ने की थी, लेकिन उनकी बेटी मुक्ता दाभोलकर की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दायर किए जाने के बाद, 2014 में जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दी गई। अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि सचिन अंदुरे हमलावरों में से एक था।
कोर्ट ने 2024 में सुनाई थी सजा
दस मई 2024 को, एक सत्र अदालत ने नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में सचिन अंदुरे और शरद कालस्कर को दोषी ठहराया था और उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हालांकि, उन्हें गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और शस्त्र अधिनियम के तहत लगे आरोपों से बरी कर दिया गया था।
अंदुरे ने अपील दायर की थी
कोर्ट ने अपर्याप्त सबूतों का हवाला देते हुए वीरेंद्र सिंह तावड़े, संजीव पुनालेकर और विक्रम भावे को भी बरी कर दिया था। सचिन अंदुरे ने अपनी सजा को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में अपील दायर की थी और एक अंतरिम अर्जी में ज़मानत तथा अपनी उम्रकैद की सज़ा पर रोक लगाने का अनुरोध किया था।
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बॉम्बे हाई कोर्ट ने मंगलवार को इस अर्जी को मंजूरी दे दी। दाभोलकर की बेटी मुक्ता ने भी हाई कोर्ट में अपील दायर की थी, जिसमें इस मामले में बरी किए जाने और सचिन अंदुरे और कालस्कर के खिलाफ यूएपीए के तहत आरोप न लगाने को चुनौती दी गई थी। उन्होंने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि यह हत्या दक्षिणपंथी चरमपंथियों की एक बड़ी साजिश का हिस्सा थी।