उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) अपना सियासी कुनबा बढ़ाने में जुटी है, लेकिन समाजवादी पार्टी के तीन बागी विधायकों की एंट्री पार्टी के लिए नई चुनौती भी खड़ी कर सकती है। राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह और विनोद चतुर्वेदी 14 अक्टूबर को बीजेपी में शामिल होने जा रहे हैं। तीनों नेताओं के आने से सपा को झटका लगना तय माना जा रहा है, लेकिन बीजेपी के सामने सबसे बड़ा सवाल इन नेताओं को चुनावी मैदान में कहां उतारने का होगा। अमेठी की गौरीगंज और अयोध्या की गोसाईंगंज सीट पर पुराने दावेदारों के साथ नए समीकरण टकरा सकते हैं। ऐसे में 2027 से पहले बीजेपी के भीतर ठाकुर बनाम ब्राह्मण की सियासी खींचतान तेज होने की आशंका है।
अमेठी की गौरीगंज सीट से विधायक राकेश प्रताप सिंह 2012 से लगातार समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतते रहे हैं। 2024 के राज्यसभा चुनाव में बीजेपी प्रत्याशी के पक्ष में क्रॉस वोटिंग के बाद उनका सपा से टकराव बढ़ा और पार्टी ने जून 2025 में उन्हें निष्कासित कर दिया था। अब उनकी बीजेपी में एंट्री की तैयारी है।लेकिन यहां बीजेपी के सामने पूर्व प्रत्याशी चंद्र प्रकाश मिश्र मटियारी को साधने की चुनौती होगी।
मटियारी 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के टिकट पर मैदान में उतरे थे और गौरीगंज में उनकी अपनी राजनीतिक पकड़ है।मटियारी ने साफ कहा है कि पार्टी में शामिल होने भर से किसी को टिकट नहीं मिल जाता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह खुद भी उम्मीदवारी की तैयारी कर रहे हैं और अंतिम फैसला पार्टी तथा संगठन को करना है।ऐसे में अगर बीजेपी राकेश प्रताप सिंह को गौरीगंज से टिकट देती है, तो मटियारी की दावेदारी पर असर पड़ सकता है। पार्टी के लिए चुनौती केवल एक उम्मीदवार चुनने की नहीं, बल्कि स्थानीय नेताओं और उनके समर्थकों को साथ बनाए रखने की भी होगी।
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गोसाईंगंज में अभय सिंह और खब्बू तिवारी की चुनौती
अयोध्या की गोसाईंगंज सीट पर भी बीजेपी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। यहां विधायक अभय सिंह बीजेपी में शामिल होने जा रहे हैं, जबकि पूर्व विधायक इंद्र प्रताप तिवारी उर्फ खब्बू तिवारी इस क्षेत्र में बीजेपी के प्रमुख ब्राह्मण चेहरों में गिने जाते हैं।अभय सिंह 2012 में पहली बार सपा के टिकट पर विधायक बने थे। 2017 में उन्हें खब्बू तिवारी ने हराया, लेकिन 2022 में अभय सिंह ने फिर जीत दर्ज की। दोनों नेताओं के बीच पुरानी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता रही है।अब सवाल यह है कि बीजेपी 2027 में गोसाईंगंज से किस पर भरोसा जताएगी। अगर अभय सिंह को दोबारा इसी सीट से उतारा जाता है, तो खब्बू तिवारी की दावेदारी प्रभावित हो सकती है। वहीं, पुराने नेता को नजरअंदाज करने की स्थिति में पार्टी के स्थानीय समीकरण बिगड़ने का खतरा रहेगा।यही वजह है कि अभय सिंह की एंट्री को सिर्फ सपा के एक विधायक के बीजेपी में आने के तौर पर नहीं देखा जा रहा। इसके साथ गोसाईंगंज में पुराने राजनीतिक संघर्ष और टिकट की दावेदारी भी जुड़ी हुई है।
कालपी में विनोद चतुर्वेदी के सामने नई परीक्षा
जालौन की कालपी सीट से विधायक विनोद चतुर्वेदी भी बीजेपी में शामिल होने जा रहे हैं। उनका राजनीतिक सफर कांग्रेस से शुरू हुआ था। वह 2007 में कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने और बाद में समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। 2022 में उन्होंने कालपी से जीत दर्ज की थी। 2022 के चुनाव में विनोद चतुर्वेदी ने निषाद पार्टी के प्रत्याशी छोटे सिंह को 2,816 वोटों के अंतर से हराया था। छोटे सिंह बीजेपी गठबंधन के उम्मीदवार थे। अब विनोद चतुर्वेदी के बीजेपी में आने से कालपी में भी पुराने दावेदारों और नए राजनीतिक समीकरणों का सवाल उठेगा। हालांकि, यहां मुकाबले को सीधे ठाकुर बनाम ब्राह्मण की लड़ाई मान लेना जल्दबाजी होगी। टिकट किसे मिलेगा, स्थानीय संगठन किसके साथ खड़ा होगा और गठबंधन के पुराने नेताओं को कैसे समायोजित किया जाएगा, ये फैसले भी अहम होंगे।
बीजेपी के सामने जातीय संतुलन बचाने की चुनौती
बीजेपी के लिए तीनों विधायकों को पार्टी में शामिल कराना राजनीतिक ताकत बढ़ाने का मौका है। ये नेता अपने-अपने क्षेत्रों में चुनावी अनुभव और स्थानीय प्रभाव रखते हैं। चुनाव में नए चेहरों को आगे बढ़ाते समय पुराने दावेदारों की नाराजगी से बचना भी पार्टी के लिए जरूरी होगा।गौरीगंज और गोसाईंगंज में नए नेताओं की दावेदारी का असर बीजेपी के पुराने ब्राह्मण चेहरों पर पड़ सकता है।
कालपी में भी पार्टी को अपने पुराने सहयोगियों और स्थानीय नेताओं के हितों का ध्यान रखना होगा।विपक्ष इस पूरे घटनाक्रम को बीजेपी के भीतर जातीय असंतुलन के मुद्दे से जोड़ सकता है। अगर टिकट बंटवारे के दौरान किसी प्रभावशाली नेता की अनदेखी होती है, तो उसका असर संबंधित सीट से आगे भी दिखाई दे सकता है। हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इन संभावित समीकरणों के चलते पार्टी में खुली बगावत होगी।
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2027 से पहले टिकट की लड़ाई बनेगी असली परीक्षा
तीनों विधायकों की बीजेपी में एंट्री से सपा को राजनीतिक झटका लग सकता है, लेकिन बीजेपी के लिए असली परीक्षा उसके बाद शुरू होगी। पार्टी को तय करना होगा कि नए नेताओं को किस तरह जिम्मेदारी दी जाए और पुराने दावेदारों की राजनीतिक जमीन कैसे सुरक्षित रखी जाए। फिलहाल सबसे ज्यादा नजर गौरीगंज और गोसाईंगंज पर है, जहां राकेश प्रताप सिंह और अभय सिंह की संभावित दावेदारी पुराने नेताओं के सामने चुनौती बन सकती है।
बीजेपी अगर संतुलन बनाने में सफल रही तो इन नेताओं का अनुभव उसके काम आ सकता है। लेकिन टिकट के सवाल पर तालमेल बिगड़ा, तो यही एंट्री पार्टी के लिए अंदरूनी असंतोष की वजह भी बन सकती है।ऐसे में 2027 की लड़ाई से पहले सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सपा के तीन विधायक बीजेपी में क्यों जा रहे हैं, बल्कि यह भी है कि उनकी एंट्री के बाद बीजेपी अपने पुराने नेताओं और नए चेहरों के बीच संतुलन कैसे बनाएगी।