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दिल्ली यूनिवर्सिटी में स्पाइनल कॉर्ड इंजरी पर कॉन्क्लेव, बचाव और इलाज पर चर्चा

दिल्ली यूनिवर्सिटी में विश्व स्पाइनल कॉर्ड इंजरी दिवस को लेकर जागरूकता कॉन्क्लेव हुआ। इसमें रीढ़ की चोट से बचाव, सही प्राथमिक उपचार और पुनर्वास पर चर्चा की गई।

Dr. B.R. Ambedkar Auditorium

विश्व स्पाइनल कॉर्ड इंजरी दिवस, Photo Credit- Dr. B.R. Ambedka

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नई दिल्ली में विश्व स्पाइनल कॉर्ड इंजरी दिवस के मौके पर दिल्ली यूनिवर्सिटी में एक खास कॉन्क्लेव का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम 1 सितंबर 2026 को यूनिवर्सिटी के समाज कार्य विभाग के डॉ. बी.आर. अंबेडकर ऑडिटोरियम में हुआ। विश्व स्पाइनल कॉर्ड इंजरी दिवस हर साल 5 सितंबर को मनाया जाता है। इस बार कार्यक्रम की थीम ‘चोट के पार, एक समावेशी भविष्य का निर्माण’ रखी गई।

 

कार्यक्रम का मुख्य मकसद रीढ़ की हड्डी में चोट से बचाब, चोट लगने के बाद सही समय पर प्राथमिक उपचार, इलाज के बाद दोबारा सामान्य जीवन जीने और दिव्यांग लोगों के अधिकारों के बारे में जागरूकता बढ़ाना था। इस कार्यक्रम का आयोजन पीपल एंड पर्पज फाउंडेशन और आई-क्रिएट फाउंडेशन ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के समाज कार्य विभाग के सहयोग से किया।

 

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चोट के बाद सही मदद जरूरी

कार्यक्रम में मैक्स हेल्थकेयर के डॉ. सुमित सिन्हा मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए। श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट की विशेषज्ञ टीम ने भी इसमें हिस्सा लिया। विशेषज्ञों ने बताया कि रीढ़ की हड्डी में चोट लगने के बाद तुरंत सही प्राथमिक उपचार मिलना बहुत जरूरी है। सही समय पर मिलने वाली मदद से मरीज की हालत को बिगड़ने से रोकने में मदद मिल सकती है।

 

इस दौरान समाज कार्य विभाग के दूसरे वर्ष के छात्रों ने नुक्कड़ नाटक भी पेश किया। इसमें रीढ़ की हड्डी की चोट से जूझ रहे लोगों की परेशानियों और चोट के बाद दोबारा अपनी जिंदगी संभालने की कोशिश को दिखाया गया। कार्यक्रम में  ‘लाइफ बियॉन्ड इंजरी’ विषय पर पैनल चर्चा भी हुई। इसमें डॉक्टरों के साथ मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, दिव्यांग अधिकार कानून के जानकार और स्पाइनल कॉर्ड इंजरी से प्रभावित लोग शामिल हुए। चर्चा में दिव्यांग लोगों के लिए आसान पहुंच वाली सुविधाओं, इलाज के बाद पुनर्वास और सहायक तकनीक पर बात की गई।

 

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संस्थान की डीन प्रोफेसर नीना पांडे और आयोजक जलज नगर ने कहा कि इस तरह के कार्यक्रमों से रीढ़ की हड्डी की चोट को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ेगी। साथ ही चोट से प्रभावित लोगों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने में भी मदद मिलेगी।


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