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पहले था कचरा, अब कमाई का जरिया; बिहार में केले का तना बदल रहा किस्मत

बिहार के खगड़िया जिले के बंदेहरा पंचायत में किसान केले के तने से प्रोडक्ट बना रहे हैं। पहले कभी इसे वह कचरा समझते थे, लेकिन अब यह कमाई का जरिया बन रहा है।

Bihar News

प्रतीकात्मक फोटो। ( AI Generated Image)

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संजय सिंह, पटना। कभी खेतों में सड़कर गंदगी और दुर्गंध फैलाने वाला केला का तना आज खगड़िया जिले के किसानों के लिए समृद्धि का प्रतीक बन गया है। परबत्ता प्रखंड की बंदेहरा पंचायत के करीब 50 किसानों ने नवाचार, सामूहिक प्रयास और सरकारी अभियान के सहयोग से केले के अपशिष्ट को आय का स्थायी साधन बना दिया है। यह पहल न सिर्फ किसानों की आमदनी बढ़ा रही है, बल्कि गांवों को स्वच्छ और पर्यावरण अनुकूल बनाने में भी मील का पत्थर साबित हो रही है।

 

बंदेहरा पंचायत में किसान करीब 15 एकड़ भूमि पर केले की खेती करते हैं। पहले स्थिति यह थी कि फल निकालने के बाद तने और अन्य अवशेष खेतों में ही फेंक देते थे। इससे गांव के आसपास गंदगी फैलती थी और किसानों को इसके निस्तारण पर अतिरिक्त मेहनत व खर्च करना पड़ता था, लेकिन लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत शुरू हुई योजनाओं ने इस समस्या को अवसर में बदल दिया।

 

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अपशिष्ट से उत्पाद, उत्पाद से रोजगार

किसानों ने केले के तने से रेशा निकालकर वस्त्र, बैग, टोकरी, मैट, कालीन और हैंडीक्राफ्ट टोपी जैसे आकर्षक उत्पाद बनाने लगे हैं। ये सभी उत्पाद पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल हैं और देश ही नहीं, विदेश तक अपनी पहचान बना चुके हैं। पर्यटक खासतौर पर केले के रेशे से बनी टोपी और हस्तशिल्प उत्पादों को पसंद कर रहे हैं।

 

किसानों को अब प्रति केले के तने के हिसाब से केला किसान सहकारी समिति द्वारा भुगतान किया जाता है। इससे उन्हें फसल के फल के अलावा एक अतिरिक्त आय स्रोत मिला है। कई किसानों की मासिक आमदनी में हजारों से लाखों रुपये तक की वृद्धि हुई है।

महिलाओं की भागीदारी ने दी नई ताकत

केले के तने से रेशा निकालने के बाद बचने वाले पल्प वेस्ट को भी बेकार नहीं जाने दिया गया। केला किसान सहकारी समिति के माध्यम से इससे उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद तैयार की जा रही है। इस खाद की बाजार में भारी मांग है और यह 50 रुपये प्रति किलो तक बिक रही है। इस पूरी प्रक्रिया में जीविका से जुड़ीं करीब 50 महिलाओं का समूह सक्रिय रूप से काम कर रहा है। ये महिलाएं न सिर्फ जैविक खाद तैयार कर रही हैं, बल्कि करीब 80 एकड़ भूमि पर सामूहिक जैविक खेती को भी बढ़ावा दे रही हैं। इससे महिलाओं को रोजगार, आत्मनिर्भरता और सामाजिक पहचान तीनों मिली है।

 

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आसपास गांवों के लिए प्रेरणा 

जिला स्तर पर अभियान से जुड़े अधिकारियों के अनुसार इस मॉडल से किसानों को फसल अवशेष निस्तारण पर अब कोई खर्च नहीं करना पड़ता। उल्टे, वही अवशेष आज उनकी आय का मजबूत जरिया बन गया है। साथ ही गांवों की साफ-सफाई में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है। यह प्रयोग आज आसपास के गांवों के लिए प्रेरणा बन चुका है। जिस केले के तने को कभी कचरा समझा जाता था, वही अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था, महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण का मजबूत आधार बन गया है।

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