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कम थालियां, बजट ज्यादा, गुजरात में मिड-डे मील योजना का ऐसा हाल क्यों?

गुजरात में प्रधानमंत्री पोषण योजना के तहत मिलने वाले मिड डे मील की खुराक में गिरावट देखी जा रही है लेकिन खर्च लगातार बढ़ रहा है। ऐसा क्यों है, आइए समझते हैं।

Mid Day Meal

मिड डे मील। Photo Credit: PTI

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गुजरात में मिड-डे मील (PM-POSHAN योजना) पर सरकार ने कुछ ऐसा बताया है, जो चौंकाने वाला है। स्कूलों में बच्चों को दिए जाने वाले मिड-डे मील की संख्या लगातार गिर रही है, लेकिन इस योजना पर खर्च तेजी से बढ़ रहा है। कम होती थालियों पर बढ़ते खर्च की बात,खुद सरकार मान रही है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2022-23 में हर दिन 42,21,257 बच्चों को मिड-डे मील दिया जाता था, साल 2023-24 में यह संख्या घटकर 41,80,492 रह गई है। साल 2024 से 2025 के बीच इस संख्या में और गिरावट आई है। अब यह आंकड़े, 40,44,689 पर सिमट गए हैं। तीन साल में कुल 1.76 लाख मील कम परोसे गए।

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खर्च कितना हो रहा है?

मिड डे मील पर होने वाला खर्च, चौंकाने वाला है। साल 2022-23 में इस योजना पर 1,035.82 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। 2023-24 में यह बढ़कर 1,155.98 करोड़ हो गए और 2024-25 में खर्च और ज्यादा बढ़कर 1,626.08 करोड़ रुपये पहुंच गया। 3 साल में खर्च में 57 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है।

कैसे हुआ खुलासा?

शिक्षा मंत्री प्रद्युमन वाजा ने विधानसभा में कांग्रेस विधायक इमरान खेड़ावाला के सवाल के जवाब में यह जानकारी दी। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि मिड डे मील पर होने वाले खर्च के बढ़ने की वजह इनपुट लागत में इजाफा है। 

क्यों 57 फीसदी खर्च बढ़ गया? 

सरकारी अधिकारियों का मानना है कि रसोई के सामान, खाने की चीजों और अन्य जरूरी चीजों की कीमतें बढ़ी हैं। किचन शेड, बर्तन और स्टोरेज वेसल जैसी चीजों पर भी खर्च हो रहा है। कई बच्चे, जो शहरी और कस्बाई इलाकों से आते हैं, वे अपने साथ घर से टिफिल ला रहे हैं। मिड-डे मील लेने वालों की संख्या कम हो रही है। गांवों में बच्चे अभी भी स्कूल का खाना ही खाते हैं। गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को मिड-डे मील बनाने और परोसने के लिए दिए जाने वाले पैसे भी बढ़े हैं। 

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NGO को कितना फंड मिला?

साल 2022-23 में NGOs को 77.63 करोड़ रुपये दिए गए थे, जो 2024-25 में बढ़कर 144.88 करोड़ रुपये हो गए। राज्य के कुल 32,266 सरकारी स्कूलों में कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को इस योजना का लाभ दिया जा रहा है। 

चिंता की बात क्या है?

साल 1984 में जब यह योजना आई, तब इसे लागू करने वाला दूसरा राज्य, गुजरात ही था। यह योजना बच्चों की पढ़ाई बढ़ाने, स्कूल छोड़ने की दर कम करने और गरीब परिवारों पर बोझ घटाने के लिए शुरू की गई थी। आंकड़े बता रहे हैं कि खाना खाने वाले लोग कम हो रहे हैं, खर्च बढ़ रहा है।

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