राजस्थान के जयपुर में हाई कोर्ट ने महिलाओं की प्राइवेसी और उनके सम्मान को सुरक्षित रखने के लिए एक बहुत बड़ा और जरूरी फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से आदेश दिया है कि किसी भी आपराधिक मामले से जुड़ी पीड़ित महिलाओं की पर्सनल तस्वीरों और वीडियो को कोर्ट के रिकॉर्ड में सबके सामने खुलेआम जमा नहीं किया जा सकता है। ऐसे सभी सामान को अब से जरूरी रूप से सिर्फ और सिर्फ सुरक्षित बंद लिफाफे में ही कोर्ट में जमा करना होगा।
यह पूरा मामला तब सामने आया जब जस्टिस अनूप कुमार ढंड एक क्रिमिनल मिसलेनियस पिटीशन की सुनवाई कर रहे थे। यह याचिका कोटपुतली जिले के रहने वाले नवीन नाम के एक व्यक्ति ने लगाई थी। नवीन पर रेप का एक केस दर्ज था और वह उस एफआईआर को पूरी तरह से रद्द करवाना चाहता था।
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पेन ड्राइव का सबूत
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक नवीन के वकील देशराज कालवानिया ने कोर्ट में दलील दी कि उनका क्लाइंट नवीन बिल्कुल बेगुनाह है और उसे झूठे केस में फंसाकर जेल में बंद किया गया है। अपने इस दावे को सच साबित करने के लिए उन्होंने कोर्ट के सामने कुछ फोटो और एक पेन ड्राइव पेश की थी। इस पेन ड्राइव में कुछ वीडियो रिकॉर्डिंग्स थीं। वकील देशराज कालवानिया का कहना था कि ये वीडियो दिखाते हैं कि उनका क्लाइंट बेगुनाह है।
इस मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस ढंड ने इस बात पर बहुत ज्यादा नाराजगी जताई कि शिकायत करने वाली महिला की प्राइवेट फोटो को याचिका के साथ खुलेआम जोड़कर जमा कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि इस तरह से सबके सामने फोटो लगाने से महिला की पहचान दुनिया के सामने आ जाती है और यह उसकी प्राइवेसी का बहुत बड़ा उल्लंघन है।
महिलाओं का सम्मान करें
जस्टिस ढंड ने इस बात पर जोर दिया कि प्राइवेसी और सम्मान, संविधान के आर्टिकल 21 के सबसे जरूरी हिस्से हैं। कोर्ट ने बहुत कड़े शब्दों में कहा कि जब इंसान का सम्मान चला जाता है, तो समझो सब कुछ चला जाता है। पुलिस की जांच और कोर्ट की कार्यवाही को कभी भी महिलाओं को बेइज्जत करने या नीचा दिखाने का जरिया नहीं बनने दिया जा सकता।
हाई कोर्ट ने इस बात को भी नोट किया कि अक्सर कई क्रिमिनल केसेस में आरोपी व्यक्ति ऐसी पर्सनल और प्राइवेट फोटो या वीडियो का सहारा लेते हैं ताकि वे कोर्ट को यह दिखा सकें कि उनका रिश्ता आपसी सहमति से बना था। कोर्ट ने कहा कि ऐसी चीजों को कोर्ट के रिकॉर्ड में खुलेआम रखने से महिलाओं का गलत इमेज पड़ता है और पीड़ितों को समाज के सामने सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा होना पड़ता है।
कोर्ट के पूरे राज्य के लिए सख्त नियम
हाई कोर्ट ने पूरे राज्य की कोर्ट रजिस्ट्रियों और पुलिस के बड़े अधिकारियों के लिए सख्त नियम जारी किए हैं। नए नियमों के मुताबिक एक आरोपी अपने बचाव के लिए ऐसे सामान का इस्तेमाल कर सकता है लेकिन कोई भी व्यक्ति गंदी फोटो, वीडियो, सीडी या पेन ड्राइव को याचिकाओं आवेदनों या चार्जशीट के साथ खुलेआम स्टेपल नहीं कर सकता है।
अब ऐसे सारे सामान को जरूरी रूप से सिर्फ और सिर्फ पूरी तरह से सुरक्षित बंद लिफाफे में ही फाइल करना होगा। इसके साथ ही पीड़ित महिलाओं की गोपनीयता को हर हाल में बनाए रखना होगा और उनकी पहचान बताने वाले सभी बयानों को रिकॉर्ड से मिटाना या हटाना होगा। कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि किसी भी सरकारी कागज या कोर्ट के मुकदमों की सूची में पीड़ित महिलाओं के नाम और पते बिल्कुल भी नहीं लिखे जाएंगे।
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पुलिस का जवाब
इस फैसले पर सरकारी वकील जितेंद्र सिंह राठौड़ ने कोर्ट को पूरा भरोसा दिलाया कि राज्य सरकार ऐसे संवेदनशील मामलों में पीड़ितों के सम्मान और उनकी पहचान को सुरक्षित रखने के लिए इन सभी नियमों का पूरी तरह से पालन करेगी। उन्होंने यह भी बताया कि आमतौर पर पुलिस ऐसे सामान को सबूत के तौर पर बंद लिफाफे में ही जमा करती है।