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'कानून से ऊपर नहीं है मॉरैलिटी', शादीशुदा आदमी के लिव-इन में रहने पर HC का फैसला

एक लिव-इन कपल ने कपल ने याचिका दायर की थी। महिला का आरोप है कि उसके परिवार वाले उसे जान से मारने की धमकी दे रहे हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर । Photo Credit: AI Generated

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा कि शादीशुदा पुरुष का किसी वयस्क महिला के साथ लिव-इन रिलेशन में रहना कोई अपराध नहीं है। कोर्ट ने कहा कि सामाजिक नैतिकता (मोरैलिटी) कानून से ऊपर नहीं हो सकता और अदालत का काम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है।

 

जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की डिवीजन बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी। एक लिव-इन कपल ने याचिका दायर की थी। वे दोनों वयस्क हैं और सहमति से साथ रह रहे हैं। लेकिन महिला के परिवार वाले उन्हें धमकी दे रहे हैं।

 

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लिव-इन में रहना अपराध नहीं

कोर्ट ने कहा, 'ऐसा कोई अपराध नहीं है जिसमें शादीशुदा पुरुष किसी वयस्क व्यक्ति के साथ उसकी सहमति से लिव-इन रिलेशन में रहने पर मुकदमा चलाया जा सके। नैतिकता और कानून को अलग रखना चाहिए। अगर कानून के तहत कोई अपराध नहीं बनता, तो सामाजिक राय या नैतिकता अदालत को नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने से नहीं रोक सकती।'

 

महिला ने शाहजहांपुर के सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस (एसपी) को आवेदन दिया था। उसमें लिखा है कि वह वयस्क है और अपनी मर्जी से उस पुरुष के साथ लिव-इन रिलेशन में रह रही है। लेकिन उसके माता-पिता और परिवार वाले इस रिश्ते के खिलाफ हैं और जान से मारने की धमकी दे रहे हैं। परिवार वाले ऑनर किलिंग की धमकी भी दे रहे हैं।

एसपी ने नहीं की कार्रवाई

कोर्ट ने कहा कि महिला की शिकायत पर एसपी ने अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि दो वयस्कों को साथ रहने की सुरक्षा देना पुलिस की ड्यूटी है। सुप्रीम कोर्ट के शक्ति वाहिनी मामले के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि एसपी पर इसकी खास जिम्मेदारी है।

 

कोर्ट ने दोनों याचिकाकर्ताओं के संयुक्त हलफनामे पर याचिका को स्वीकार किया। कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया कि कपल को सुरक्षा मुहैया कराई जाए। एसपी शाहजहांपुर को व्यक्तिगत रूप से इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई है। साथ ही, महिला के परिवार वालों को कपल को कोई नुकसान पहुंचाने से रोका गया है।

पहले भी कोर्ट ने दी थी सुरक्षा

पिछले साल दिसंबर में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 लिव-इन कपल्स को परिवार की धमकियों से सुरक्षा देने का आदेश दिया था। जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने कहा था कि लिव-इन रिलेशन में रहने वाले वयस्कों को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार है। राज्य को उनकी रक्षा करनी चाहिए।

 

कोर्ट ने तब कहा था कि शादी न करने का मतलब यह नहीं कि उन्हें संविधान के मौलिक अधिकारों से वंचित कर दिया जाए। जीवन का अधिकार हर नागरिक को है, चाहे वह शादीशुदा हो या नहीं।

 

यह भी पढ़ें: 'जो झूठी FIR कराए, उस पर मुकदमा करो', इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पुलिस को दिए निर्देश

 

यह फैसला उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो अपनी मर्जी से साथ रहना चाहते हैं लेकिन परिवार से खतरा महसूस करते हैं। कोर्ट ने साफ किया कि कानून नैतिकता से अलग है और वयस्कों की सहमति वाली जिंदगी की रक्षा करना राज्य की जिम्मेदारी है।

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