logo

मूड

ट्रेंडिंग:

हाई कोर्ट पहुंचा ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने का केस, UP सरकार से मांगा जवाब

ग्राम पंचायत का कार्यकाल खत्म होने पर यूपी सरकार ने प्रधानों को ही प्रशासक नियुक्त किया है। अब इस फैसलो को हाई कोर्ट में चुनौती दे दी गई है।

allahabad high court

इलाहाबाद हाई कोर्ट, File Photo Credit: Social Media

शेयर करें

google_follow_us

उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद मौजूदा प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के राज्य सरकार के फैसले पर कानूनी सवाल खड़े हो गए हैं। इस आदेश को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई 3 जून को होगी, जिसमें सरकार अपना पक्ष रखेगी।


न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने मंगलवार को ओम प्रकाश प्रजापति की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई की। याचिकाकर्ता ने सरकार के फैसले को कानून की मंशा के विपरीत बताते हुए इसे निरस्त करने की मांग की है। याची के अधिवक्ता अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी ने बताया कि सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकारी अधिवक्ता को राज्य सरकार से निर्देश प्राप्त कर बुधवार को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दिया है।

 

यह भी पढ़ें: UP के पंचायत चुनाव में होगी धनंजय सिंह और बृजेश सिंह की टक्कर? समझिए मामला

प्रधानों को प्रशासक बनाने के फैसले पर उठे सवाल

याचिका में कहा गया है कि ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद मौजूदा प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करना स्थापित कानूनी व्यवस्था और पूर्व परंपराओं के अनुरूप नहीं है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि सरकार ने नियमों की मूल भावना के विपरीत जाकर यह फैसला लिया है, जिसकी न्यायिक समीक्षा आवश्यक है।


अब हाई कोर्ट में यह सवाल प्रमुख रूप से उठेगा कि क्या कार्यकाल समाप्त होने के बाद किसी निर्वाचित प्रधान को ही प्रशासक नियुक्त किया जा सकता है या नहीं।

 

चुनाव में देरी के चलते लिया गया था फैसला

प्रदेश सरकार ने पंचायत चुनाव में संभावित देरी और आरक्षण प्रक्रिया लंबी खिंचने की आशंका को देखते हुए यह निर्णय लिया था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मंजूरी के बाद पंचायती राज विभाग ने आदेश जारी कर प्रदेश की 57,694 ग्राम पंचायतों में मौजूदा प्रधानों को छह माह तक प्रशासक नियुक्त करने का फैसला किया था।

 

सरकार का तर्क है कि यदि प्रशासक की नियुक्ति नहीं की जाती तो गांवों में विकास कार्य प्रभावित हो सकते थे। सफाई, पेयजल, मनरेगा, सड़क मरम्मत और अन्य विकास योजनाओं के संचालन में बाधा आने की संभावना थी।

 

यह भी पढ़ें: विधान परिषद चुनाव में सभी सीटें जीतने की तैयारी, BJP में आने वाले हैं दो MLC?

पहले ADO पंचायत को मिलती थी जिम्मेदारी

उत्तर प्रदेश में लंबे समय से यह व्यवस्था रही है कि ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने पर संबंधित क्षेत्र के एडीओ पंचायत (सहायक विकास अधिकारी पंचायत) को प्रशासक नियुक्त किया जाता था। लेकिन इस बार सरकार ने परंपरा से हटकर मौजूदा प्रधानों को ही प्रशासक बनाने का फैसला किया। बताया जा रहा है कि राज्य ग्राम प्रधान संघ की मांग और विकास कार्यों की निरंतरता बनाए रखने के उद्देश्य से यह निर्णय लिया गया था।

 

प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के फैसले को लेकर राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा तेज है। विपक्षी दल इस निर्णय को आगामी विधानसभा चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं। उनका आरोप है कि सरकार ग्राम पंचायत स्तर पर अपने राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखने के लिए यह कदम उठा रही है, जबकि सरकार का कहना है कि फैसला पूरी तरह प्रशासनिक जरूरतों को ध्यान में रखकर लिया गया है।

 

3 जून की सुनवाई पर टिकी निगाहें

अब सभी की नजरें हाई कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। यदि अदालत सरकार के आदेश पर सवाल उठाती है तो प्रदेश की 57 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों में प्रशासक व्यवस्था पर असर पड़ सकता है। वहीं सरकार अदालत के समक्ष यह साबित करने की कोशिश करेगी कि विकास कार्यों की निरंतरता बनाए रखने के लिए लिया गया फैसला जनहित में है।

Related Topic:#UP News

और पढ़ें