सड़क दुर्घटना में किसी व्यक्ति की मौत होने पर यदि दुर्घटना के समय वाहन चालक के पास केवल लर्निंग लाइसेंस था, तो क्या बीमा कंपनी मुआवजा देने की जिम्मेदारी से बच सकती है? हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने इस सवाल पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल लर्निंग लाइसेंस होने के आधार पर बीमा कंपनी तीसरे पक्ष के मुआवजा दावे से अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती।
अदालत ने कहा कि लर्निंग लाइसेंस भी मोटर वाहन अधिनियम के तहत वैध लाइसेंस है और निर्धारित शर्तों के अधीन वाहन चलाने वाले व्यक्ति को केवल इसी आधार पर बिना लाइसेंस वाला चालक नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति वीरेंद्र सिंह की अदालत ने ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की अपील खारिज करते हुए मुआवजे की राशि 33,97,440 रुपये से बढ़ाकर 34,03,030 रुपये कर दी। यानी मृतक के परिजनों के लिए मुआवजे में 5,590 रुपये की बढ़ोतरी की गई। अदालत ने पूरी मुआवजा राशि के भुगतान की जिम्मेदारी भी बीमा कंपनी पर बरकरार रखी।
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क्या था पूरा मामला?
यह मामला चंबा में हुए एक सड़क हादसे से जुड़ा है, जिसमें तीन मई 2013 को 37 वर्षीय बाबू राम की मोटरसाइकिल की चपेट में आने से मौत हो गई थी। दुर्घटना के समय मोटरसाइकिल चालक पंकज कुमार के पास लर्निंग लाइसेंस था। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, चंबा ने 21 अक्तूबर 2014 को मामले में 33,97,440 रुपये का मुआवजा निर्धारित किया था और भुगतान की जिम्मेदारी बीमा कंपनी पर डाली थी। इस आदेश को ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। बीमा कंपनी का तर्क था कि दुर्घटना के समय चालक के पास केवल लर्निंग लाइसेंस था और इस कारण बीमा पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन हुआ था। कंपनी ने मुआवजे की राशि को भी अधिक बताते हुए उसमें कमी करने की मांग की थी।
बीमा कंपनी की दलील क्यों नहीं मानी गई?
बीमा कंपनी ने दलील दी कि लर्निंग लाइसेंस के आधार पर वाहन चलाने वाले व्यक्ति को विधिवत लाइसेंसधारी चालक नहीं माना जाना चाहिए। कंपनी ने मोटर वाहन अधिनियम और केंद्रीय मोटर वाहन नियमों का हवाला देते हुए अपनी जिम्मेदारी से मुक्त करने की मांग की। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि लर्निंग लाइसेंस भी कानून के तहत जारी किया जाने वाला लाइसेंस है।
निर्धारित शर्तों के अनुपालन में वाहन चलाने वाले व्यक्ति को केवल लर्निंग लाइसेंस होने के कारण अवैध चालक नहीं कहा जा सकता। अदालत ने केंद्रीय मोटर वाहन नियमों के प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए मोटरसाइकिल चलाने के प्रशिक्षण से संबंधित नियमों पर भी विचार किया। फैसले में मोटरसाइकिल के मामले में दोहरे नियंत्रण वाले वाहन और प्रशिक्षक की अनिवार्य मौजूदगी से संबंधित लागू छूट का उल्लेख किया गया।
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प्रशिक्षक के लाइसेंस को लेकर भी उठा सवाल
मामले में चालक की ओर से कहा गया था कि दुर्घटना के समय वह लर्निंग लाइसेंस पर वाहन चला रहा था और उसके साथ वैध लाइसेंसधारी प्रशिक्षक मौजूद था, जिसके निर्देशों के अनुसार वह मोटरसाइकिल चला रहा था। बीमा कंपनी ने प्रशिक्षक के लाइसेंस को लेकर भी सवाल उठाए। इस पर अदालत ने कहा कि जब बीमा कंपनी की ओर से बीमा पॉलिसी की शर्तों के मूल उल्लंघन का आरोप लगाया गया है, तो उसे साबित करने का दायित्व भी उसी पर है।
अदालत के अनुसार, बीमा कंपनी यह साबित करने में विफल रही कि संबंधित प्रशिक्षक के पास वैध और प्रभावी ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था। इस तथ्य की जांच के लिए संबंधित व्यक्ति को गवाह के रूप में बुलाने का अवसर भी बीमा कंपनी के पास था।
क्या अब हर लर्निंग लाइसेंस धारक को मिल जाएगी कानूनी छूट?
हाईकोर्ट के फैसले का अर्थ यह नहीं है कि लर्निंग लाइसेंस धारक किसी भी परिस्थिति में वाहन चलाने के लिए स्वतंत्र हैं या बीमा कंपनी हर मामले में स्वतः मुआवजा देने के लिए बाध्य होगी। लर्निंग लाइसेंस पर वाहन चलाते समय लागू कानूनी शर्तों का पालन जरूरी है। दुर्घटना के मामलों में लाइसेंस की वैधता, उसके साथ जुड़ी शर्तें, बीमा पॉलिसी और संबंधित तथ्यों की भी जांच की जा सकती है।
अदालत ने बीमा कंपनी की ओर से कथित मूल उल्लंघन साबित नहीं किए जाने और लागू कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए अपना निर्णय दिया। यह निर्णय सड़क दुर्घटना पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है। इससे स्पष्ट होता है कि मुआवजे के मामलों में केवल लर्निंग लाइसेंस का हवाला देकर बीमा कंपनी अपनी जिम्मेदारी से बचने का दावा नहीं कर सकती। मामले के तथ्यों और कानून के अनुरूप ही दायित्व तय होगा।