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'सार्वजनिक जगहों पर नमाज पढ़ना गलत', मुस्लिम नेता ने कोर्ट के फैसले को सही बताया

कांग्रेस नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद हुसैन दलवई ने कहा, 'अगर लोग सार्वजनिक जगहों पर लगातार, हर समय नमाज पढ़ेंगे तो यह सच में गलत होगा

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नमाज पढ़ते लोग। Photo Credit- PTI

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महाराष्ट्र कांग्रेस के सीनियर नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद हुसैन दलवई ने शनिवार को सार्वजनिक जगहों पर नमाज पढ़ने की याचिका को इलाहाबाद हाईकोर्ट के द्वारा खारिज किए जाने के फैसले पर प्रतिक्रिया दी। दलवई ने कहा कि सार्वजनिक जगहों पर हर वक्त नमाज पढ़ते रहना गलत है। बयान देते हुए उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया।

 

कांग्रेस नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद हुसैन दलवई ने कहा, 'अगर लोग सार्वजनिक जगहों पर लगातार, हर समय नमाज पढ़ेंगे तो यह सच में गलत होगा। मेरे हिसाब से, मस्जिदों में 2-3 बार नमाज पढ़ी जा सकती है। इसलिए, अगर किसी ने सार्वजनिक जगह के ऐसे इस्तेमाल के बारे में शिकायत की है, तो इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को गलत या अनुचित नहीं माना जा सकता।'

 

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सभी सार्वजनिक जगहों का इस्तेमाल करते हैं

उन्होंने कहा, 'हालांकि, ईद के दौरान लोगों की बड़ी मात्रा में भीड़ इकट्ठा होती है। अगर वे ऐसे समय में किसी सार्वजनिक जमीन या खुली जगह का इस्तेमाल नमाज पढ़ने के लिए करते हैं तो यह काम है। क्योंकि सभी धर्मों के लोग सार्वजनिक जगहों का इसी तरह इस्तेमाल करते हैं।'

 

 

 

 

बता दें कि शनिवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सार्वजनिक जगह पर नमाज पढ़ने को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा है कि ऐसी जमीन का इस्तेमाल किसी एक पक्ष द्वारा धार्मिक गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने संभल जिले में गुन्नौर तहसील अंतर्गत इकौना निवासी असीन की याचिका खारिज कर दी है।

सार्वजनिक जमीन पर सभी का समान अधिकार- कार्ट

कोर्ट ने साफ किया कि सार्वजनिक जमीन पर सभी का समान अधिकार होता है। इसका एकतरफा इस्तेमाल कानून स्वीकार्य नहीं है। जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने इसी निर्णय में कहा कि पूर्व में मुनाजिर खान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य के मामले में हाईकोर्ट ने आदेश दिया है।

 

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'धार्मिक प्रथा में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता'

हाईकोर्ट ने निजी परिसरों के भीतर सद्भावनापूर्ण प्रार्थना की रक्षा करते हुए माना था कि व्यक्तिगत धार्मिक प्रथा में मनमाने ढंग से हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता लेकिन इन फैसलों को यह मानकर नहीं पढ़ा जा सकता कि निजी परिसरों में संगठित या नियमित सामूहिक गतिविधि की पूरी छूट है। जहां गतिविधि उस क्षेत्र से आगे बढ़ती है और सार्वजनिक क्षेत्र को प्रभावित करना शुरू करती है, वहां वैध विनियमन लागू होता है।

 

कोर्ट ने कहा कि पूर्व निर्णय निजी परिसरों को अनियंत्रित सार्वजनिक जगहों में बदलने का अधिकार नहीं देता है। कोर्ट का कहना है कि धर्म का पालन करने का अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है और इसका इस्तेमाल इस तरह से नहीं किया जा सकता कि यह दूसरों के इन अधिकारों में हस्तक्षेप करे। अगर जमीन को निजी मान भी लिया जाए तो भी याचिकाकर्ता मांगी गई राहत का हकदार नहीं है।

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