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खुशवंत सिंह लिटफेस्ट: पूर्व आर्मी चीफ नरवणे ने युवा लेखकों को क्या नसीहत दी?

हिमाचल के कसौली में शुरू हुए 15वें खुशवंत सिंह लिटफेस्ट में पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने जिम्मेदार लेखन पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कलम को तलवार की तरह सम्मान के साथ चलाएं।

जनरल नरवणे, Photo Credit-Internet

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विचारों का टकराव लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता का प्रमाण है। असली चुनौती तब पैदा होती है, जब किसी विचार से असहमति रखने वाला व्यक्ति ही निशाने पर आ जाए और तर्क की जगह व्यक्तिगत हमले लेने लगें। हिमाचल प्रदेश के कसौली में शुरू हुए 15वें खुशवंत सिंह लिटफेस्ट में पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने इसी सवाल को केंद्र में रखते हुए युवा लेखकों को ऐसा संदेश दिया, जो आज के सार्वजनिक विमर्श, पत्रकारिता और सोशल मीडिया की बहसों के लिए भी महत्वपूर्ण है।

 

रिटायर्ड जनरल नरवणे ने कहा कि मुद्दों पर असहमति जताएं लेकिन व्यक्ति का अनादर न करें। उन्होंने युवा लेखकों से गंभीर विषयों पर बिना दुर्भावना के लिखने का आह्वान करते हुए कहा कि लेखन निर्भीक होना चाहिए, लेकिन उसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होनी चाहिए। उनके मुताबिक, कलम का इस्तेमाल तलवार की तरह सम्मान और मर्यादा के साथ किया जाना चाहिए। सोलन जिले के कसौली क्लब में शुक्रवार को शुरू हुए तीन दिवसीय साहित्यिक महोत्सव में नरवणे की यह टिप्पणी इस वर्ष की थीम 'द आर्ट ऑफ डिसएग्रीमेंट : कन्वर्सेशंस अक्रॉस डिवाइड्स' यानी 'असहमति की कला: वैचारिक दूरियों के पार संवाद' से भी जुड़ी रही।

विचारों की लड़ाई में व्यक्ति क्यों बन जाता है निशाना?

आज राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक बहसों में असहमति कई बार व्यक्तिगत विरोध का रूप ले लेती है। किसी मुद्दे पर अलग राय रखने वाले को जवाब देने के बजाय उसकी मंशा, पहचान या व्यक्तित्व पर सवाल उठाए जाने लगते हैं। ऐसे माहौल में असहमति को संवाद का माध्यम बनाए रखना एक बड़ी सामाजिक चुनौती है। जनरल नरवणे का संदेश इसी बुनियादी फर्क को रेखांकित करता है कि किसी विचार, नीति, निर्णय या तर्क की आलोचना करना और किसी व्यक्ति का अपमान करना दो अलग-अलग बातें हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि सवाल पूछने, निर्णयों की समीक्षा करने और स्थापित मान्यताओं को चुनौती देने से ही नए विचारों के लिए जगह बनती है। लेकिन जब बहस का उद्देश्य समाधान के बजाय दूसरे पक्ष को नीचा दिखाना बन जाए, तो संवाद की संभावना कमजोर पड़ने लगती है। कसौली के साहित्यिक मंच से उठा यह सवाल केवल लेखकों तक सीमित नहीं है। इसका संबंध पाठकों, राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, मीडिया और डिजिटल मंचों पर सक्रिय हर उस व्यक्ति से है, जो सार्वजनिक बहस का हिस्सा है।

 

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सेना का अनुशासन, लेखन की जिम्मेदारी

पूर्व सेना प्रमुख ने सेना और लेखन, दोनों क्षेत्रों में अनुशासन को अनिवार्य बताया। उन्होंने कहा कि एक सैनिक प्रतिदिन अपनी डायरी लिखता है, उसी तरह लेखक को भी नियमित लेखन की आदत विकसित करनी चाहिए। युवा लेखकों को संबोधित करते हुए उन्होंने आगे बढ़कर नेतृत्व करने और गंभीर मुद्दों पर अपनी बात रखने की प्रेरणा दी। उनका संदेश था कि लेखक निडर होकर लिखें, लेकिन लेखन में दुर्भावना के बजाय विचार और तथ्य प्रमुख होने चाहिए।

 

यह संदेश पत्रकारिता के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है। सत्ता से सवाल करना, व्यवस्था की कमियों को उजागर करना और जनहित के मुद्दों को सामने लाना पत्रकारिता के अहम दायित्व हैं। लेकिन निर्भीकता और गैर-जिम्मेदाराना आरोपों के बीच का अंतर बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। आलोचना का आधार तथ्य हों और भाषा में जवाबदेही हो, तो असहमति समाज को बेहतर दिशा दे सकती है। इसके विपरीत, अपुष्ट दावों और व्यक्तिगत कटाक्षों से बहस का मूल मुद्दा पीछे छूट जाता है।

खुशवंत सिंह की विरासत में बेबाकी और हास्य

महोत्सव के निदेशक और दिवंगत लेखक खुशवंत सिंह के बेटे राहुल सिंह ने अपने पिता को याद करते हुए उनके अनुशासन और हास्यबोध का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि खुशवंत सिंह लगभग 70 वर्षों तक प्रतिदिन लिखते रहे। खुशवंत सिंह का साहित्यिक और पत्रकारिता जगत में एक अलग स्थान रहा। उनकी लेखनी बेबाक टिप्पणी, व्यंग्य और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर स्पष्ट राय के लिए पहचानी जाती थी। राहुल सिंह के अनुसार, उनके पिता अनुशासनप्रिय होने के साथ हास्य के बेताज बादशाह भी थे। साहित्यिक आयोजन में उनकी विरासत का स्मरण इस बात को भी सामने लाता है कि गंभीर विमर्श में हास्य, व्यंग्य और आलोचना की अपनी भूमिका होती है। लोकतंत्र में सत्ता और स्थापित मान्यताओं पर सवाल उठाने की जगह बनी रहना जरूरी है। हास्य और व्यंग्य इस विमर्श को धार दे सकते हैं, बशर्ते आलोचना और व्यक्तिगत अपमान के बीच की सीमा को समझा जाए।

 

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महिला अधिकारों से लोकतांत्रिक बदलाव तक चर्चा

लिटफेस्ट के पहले दिन साहित्य, सामाजिक अधिकारों, इतिहास, राजनीति, विज्ञान, भोजन, आस्था और मानसिक स्वास्थ्य सहित विभिन्न विषयों पर संवाद हुआ। अधिवक्ता और लेखिका मिहिरा सूद ने पत्रकार अन्ना एम. वेट्टिकाड के साथ 'गर्ल्स जस्ट वाना हैव फंडामेंटल राइट्स' सत्र में लैंगिक समानता के सवाल उठाए। चर्चा में यह बात सामने आई कि केवल कानूनी सुधारों से महिला समानता सुनिश्चित नहीं की जा सकती। लेखक और पत्रकार संजॉय हजारिका ने 'मिजोरम : फ्रॉम बैटलफील्ड टू बैलेट बॉक्स' सत्र में मिजोरम के सशस्त्र विद्रोह से लोकतांत्रिक शासन तक के सफर पर चर्चा की। इस दौरान क्षेत्र के ऐतिहासिक और राजनीतिक बदलावों को समझने का अवसर मिला।

 

शेफ और लेखक राहुल अकेरकर ने परवाना नूरानी के साथ बातचीत में बायोकेमिकल इंजीनियरिंग से पाक-कला की दुनिया तक के अपने सफर को साझा किया। अपनी आत्मकथा 'बाइटिंग मोर दैन आई कैन च्यू' के संदर्भ में उन्होंने प्रामाणिकता, सादगी और प्रयोग के महत्व पर बात की। आणविक जीवविज्ञानी से विज्ञान लेखिका बनीं उपासना सर्राजू ने जिज्ञासा, हास्य और पारंपरिक सोच से अलग सवाल पूछने की शक्ति पर विचार रखे। लेखक रूपिंदर सिंह और कमला कपूर ने व्यक्तिगत आस्था, सामूहिक पूजा, सेवा, लंगर और गुरु ग्रंथ साहिब के आध्यात्मिक महत्व पर चर्चा की। वहीं, मनोवैज्ञानिक निष्ठा लांबा और पत्रकार नारायणी गणेश के सत्र में युवाओं के गुस्से, मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक चुनौतियों पर विमर्श हुआ।

युवा लेखकों को मंच देने की पहल

महोत्सव में जनरल नरवणे ने 'केएसएलएफ फॉरएवर यंग' पहल का शुभारंभ भी किया। इसका उद्देश्य युवा और उभरते लेखकों को प्रोत्साहित करना है। तीन दिवसीय आयोजन में 45 से अधिक चर्चित हस्तियों की भागीदारी प्रस्तावित है। 23 से 25 अक्तूबर तक चलने वाले इस महोत्सव में कुल 27 सत्र रखे गए हैं, जिनमें साहित्य, राजनीति, सामाजिक बदलाव, पर्यावरण, कला और समकालीन चुनौतियों से जुड़े विषय शामिल हैं। कसौली की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और देवदार के बीच आयोजित यह साहित्यिक महोत्सव एक बार फिर विचारों के आदान-प्रदान का मंच बना है। सवाल सिर्फ असहमत होने का नहीं, असहमति को संभालने का भी है। जनरल नरवणे का संदेश इसी अंतर की ओर ध्यान दिलाता है। लोकतंत्र में हर विचार से सहमत होना जरूरी नहीं, लेकिन दूसरे विचार को सुनने, उसके तर्क को समझने और तथ्यों के आधार पर जवाब देने की गुंजाइश बनी रहनी चाहिए। शायद स्वस्थ सार्वजनिक विमर्श की शुरुआत भी यहीं से होती है।


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