कुल्लू दशहरा पर लगेगा आस्था का महाकुम्भ, 347 देवी-देवताओं को न्योता
अंतर्राष्ट्रीय कुल्लू दशहरा पर आस्था का महाकुम्भ लगने जा रहा है। उत्सव के लिए 347 देवी-देवताओं को न्योता दिया गया है। देवी देवता 200 किलोमीटर का सफर तय कर कुल्लू पहुंचेंगे।

श्री रघुनाथ जी का भव्य और एतिहासिक रथ, Photo Credit-Khabargaon
हिमाचल प्रदेश की देवभूमि में आस्था की ताकत का अनूठा नजारा देखना है तो अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां देवी-देवताओं के आगमन का मतलब सिर्फ एक धार्मिक आयोजन में शामिल होना नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं को जीवंत रखना भी है। यही वजह है कि कुल्लू दशहरा में शामिल होने के लिए बाह्य सराज के आनी और निरमंड क्षेत्र से कई देवी-देवता 150 से 200 किलोमीटर तक का सफर पैदल तय कर पहुंचेंगे। दुर्गम पहाड़ी रास्तों, लंबे पड़ावों और कठिन यात्रा के बावजूद देव समाज का उत्साह इस आयोजन को विशिष्ट बनाता है।
21 से 27 अक्तूबर तक ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में आयोजित होने वाले अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा में इस बार 347 देवी-देवताओं को निमंत्रण भेजा गया है। वर्ष 2025 में 332 देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया था। इस बार बढ़ी हुई संख्या के बीच ढालपुर एक बार फिर हिमाचल की समृद्ध देव संस्कृति के विराट संगम का साक्षी बनेगा। आयोजन की खास बात यह है कि यहां देश के दूसरे हिस्सों की तरह दशहरा रावण दहन तक सीमित नहीं रहता। भगवान रघुनाथ की रथयात्रा, देवी-देवताओं की भागीदारी और देव समाज की पारंपरिक गतिविधियां इसे अलग पहचान देती हैं। बाह्य सराज से आने वाले देवी-देवताओं की लंबी यात्रा इस उत्सव के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को और बढ़ाती है।
आस्था की राह में दूरी नहीं बनती बाधा
कुल्लू दशहरा में भाग लेने के लिए आनी और निरमंड क्षेत्र के देवी-देवताओं को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। कुछ देवालयों से कुल्लू तक की दूरी 150 से 200 किलोमीटर तक बताई जा रही है। इतने लंबे सफर में देवता के साथ देवलू, कारकून और देव परंपराओं से जुड़े अन्य लोग भी यात्रा का हिस्सा बनते हैं। यह यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने का माध्यम नहीं है। इसके साथ स्थानीय मान्यताएं, पारंपरिक रीति-रिवाज और देव समाज की सामूहिक भागीदारी जुड़ी होती है।
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यात्रा के दौरान निर्धारित पड़ावों पर ठहरना, पूजा-अर्चना करना और आगे की यात्रा की तैयारी करना इस पूरी प्रक्रिया का हिस्सा होता है। पहाड़ी भूगोल के कारण यह सफर आसान नहीं होता। रास्तों की लंबाई, मौसम की अनिश्चितता और यात्रा के दौरान व्यवस्थाएं बनाए रखना बड़ी चुनौती हो सकती है। इसके बावजूद देव समाज हर वर्ष अपनी परंपराओं को निभाने के लिए तत्पर रहता है।
347 देवी-देवताओं को न्योता, बढ़ा आयोजन का दायरा
इस वर्ष दशहरा उत्सव समिति ने 347 देवी-देवताओं को आमंत्रित किया है। पिछले वर्ष यह संख्या 332 थी। इस तरह निमंत्रण पाने वाले देवी-देवताओं की संख्या में 15 की वृद्धि हुई है। आनी-निरमंड क्षेत्र से करीब 15 से 20 देवी-देवताओं के उत्सव में भाग लेने की संभावना है। आयोजन से जुड़े विवरण के अनुसार, कुल देवी-देवताओं में लगभग 25 से 30 प्रतिशत ऐसे हैं, जिन्हें करीब 100 किलोमीटर या उससे अधिक दूरी तय करनी पड़ती है। 20 अक्तूबर से देवी-देवताओं के कुल्लू पहुंचने का सिलसिला शुरू होने की उम्मीद है। इसके साथ ही ढालपुर मैदान में अस्थायी शिविरों की रौनक बढ़ने लगेगी। सात दिन तक चलने वाले इस आयोजन में देवलू और कारकून अपने आराध्यों के साथ शिविरों में रहेंगे तथा सुबह-शाम पूजा-अर्चना और परंपरागत गतिविधियों का निर्वहन करेंगे।
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ढालपुर में उतरती है देव समाज की जीवंत परंपरा
कुल्लू दशहरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां देव संस्कृति केवल मंचों, प्रदर्शनियों या सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहती। देवी-देवताओं के रथ, उनके साथ चलने वाले देवलू और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुनें इस संस्कृति को प्रत्यक्ष रूप में सामने लाती हैं। ढालपुर में विभिन्न क्षेत्रों के देवी-देवताओं का एकत्र होना सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
अलग-अलग घाटियों और गांवों से आने वाले लोग एक ही आयोजन में भाग लेते हैं। इससे पारंपरिक संबंधों को मजबूत करने और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का अवसर मिलता है। देव परंपरा में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए यह आयोजन अपने आराध्य के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर है, जबकि पर्यटकों के लिए हिमाचल की विशिष्ट लोक संस्कृति को करीब से समझने का माध्यम है।
366 साल पुरानी परंपरा से जुड़ा है दशहरा
कुल्लू में भगवान रघुनाथ के सम्मान में दशहरा मनाने की परंपरा वर्ष 1660 से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार, राजा जगत सिंह के शासनकाल में ब्राह्मण दुर्गा दत्त की दुखद मृत्यु के बाद राजा प्रायश्चित के लिए सिद्धगुरु कृष्णदास पयहारी की शरण में पहुंचे थे। परंपरागत विवरणों के अनुसार, उनके निर्देश पर दामोदर दास गोसाईं अयोध्या से भगवान राम और सीता की मूर्तियां लेकर कुल्लू पहुंचे।
आश्विन शुक्ल दशमी के अवसर पर भगवान रघुनाथ की अध्यक्षता में यज्ञ हुआ। इसी परंपरा को कुल्लू दशहरा की शुरुआत से जोड़ा जाता है। भगवान रघुनाथ के कारदार दानवेंद्र सिंह के अनुसार, कुल्लू में दशहरा वर्ष 1660 से मनाया जा रहा है। इस लिहाज से वर्ष 2026 में इस परंपरा के 366 वर्ष पूरे हो रहे हैं। समय के साथ उत्सव का स्वरूप व्यापक हुआ है, लेकिन भगवान रघुनाथ के प्रति श्रद्धा और देवी-देवताओं की भागीदारी इसकी मूल पहचान बनी हुई है।
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2,500 दुकानों से सजेगा बाजार, 300 करोड़ के कारोबार की उम्मीद
कुल्लू दशहरा धार्मिक आयोजन के साथ एक बड़े व्यापारिक मेले के रूप में भी अपनी पहचान रखता है। इस बार उत्सव के दौरान 2,500 से अधिक दुकानों के सजने और करीब 300 करोड़ रुपये के कारोबार की उम्मीद जताई गई है। देश के विभिन्न हिस्सों से व्यापारी यहां पहुंचते हैं। मेले में कपड़े, बर्तन, घरेलू उपयोग की वस्तुओं से लेकर विभिन्न प्रकार के सामान की खरीदारी होती है। व्यापारियों के लिए यह बड़ा बाजार है, जबकि स्थानीय दुकानदारों और छोटे कारोबारियों को भी ग्राहकों की बढ़ी हुई आवाजाही से लाभ मिलने की संभावना रहती है।
दशहरे के दौरान पर्यटकों की संख्या बढ़ने से होटल, परिवहन, खानपान और अन्य पर्यटन सेवाओं से जुड़े कारोबार को भी गति मिलती है। इस प्रकार ढालपुर का आयोजन धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण बन जाता है। हालांकि, 300 करोड़ रुपये के कारोबार का अनुमान है, इसे वास्तविक कारोबार का अंतिम आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए। उत्सव समाप्त होने के बाद ही वास्तविक आर्थिक गतिविधियों का आकलन किया जा सकेगा।
पर्यटन के लिए भी बड़ा आकर्षण
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा देश-विदेश के पर्यटकों को हिमाचल की सांस्कृतिक विविधता से परिचित कराने का अवसर देता है। भगवान रघुनाथ की रथयात्रा और बड़ी संख्या में देवी-देवताओं का एक साथ जुटना इस आयोजन को अन्य मेलों से अलग बनाता है। पर्यटक यहां केवल प्राकृतिक सुंदरता देखने नहीं आते, बल्कि हिमाचल की उन परंपराओं को भी समझना चाहते हैं, जो आज भी स्थानीय समाज के जीवन का हिस्सा हैं। देव रथों की सजावट, पारंपरिक वेशभूषा, वाद्ययंत्र और धार्मिक अनुष्ठान उत्सव को विशेष पहचान प्रदान करते हैं। आनी और निरमंड से आने वाले देवी-देवताओं की लंबी पदयात्रा इस सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण पक्ष है। यह दिखाती है कि आधुनिक समय में भी स्थानीय समाज अपनी पारंपरिक मान्यताओं और सामूहिक सहभागिता को कितना महत्व देता है।
सात दिन तक दिखेगा आस्था, संस्कृति और व्यापार का संगम
21 से 27 अक्तूबर तक आयोजित होने वाला अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा एक बार फिर देव समाज, स्थानीय लोगों, व्यापारियों और पर्यटकों को एक मंच पर लाएगा। 347 देवी-देवताओं को निमंत्रण, बाह्य सराज से आने वाले देवताओं की लंबी यात्रा और बड़े व्यापारिक मेले की तैयारियां इस आयोजन के व्यापक स्वरूप को रेखांकित करती हैं। कुल्लू दशहरा की खासियत सिर्फ इसकी भव्यता नहीं, बल्कि वह परंपरा है जो पीढ़ियों से लोगों को जोड़ती आई है। आनी और निरमंड से 200 किलोमीटर तक का सफर तय कर पहुंचने वाले देवी-देवता इस उत्सव के उस पक्ष को सामने लाते हैं, जहां दूरी से ज्यादा महत्व आस्था, परंपरा और सामूहिक विश्वास का है।
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