उत्तर प्रदेश में करीब 66 वर्षों तक अपनी ही जमीन पर अधिकार पाने का इंतजार करने वाले पीलीभीत के बुजुर्ग रामचंद्र का संघर्ष आखिरकार सोमवार को खत्म हुआ। मुख्यमंत्री
योगी आदित्यनाथ
ने उन्हें भूमि का स्वामित्व प्रमाणपत्र सौंपा तो उनकी आंखों में वर्षों का इंतजार और संतोष साफ झलक रहा था। जिस जमीन को पाने के लिए उन्होंने पूरी जिंदगी संघर्ष किया, उसे अपलक निहारते रहे लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
अगले ही दिन उनकी तबीयत बिगड़ी और उनकी मौत हो गई। रामचंद्र का परिवार वर्ष 1960 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से विस्थापित होकर भारत आया था। सरकार ने उन्हें पीलीभीत के पतरासा क्षेत्र में बसाया था। परिवार वर्षों से उसी जमीन पर रहकर खेती-बाड़ी कर रहा था, लेकिन जमीन का कानूनी स्वामित्व नहीं मिलने से हर सरकारी कागज में वे खुद को असहाय महसूस करते रहे। छह दशक तक उन्होंने दफ्तरों के चक्कर लगाए, लेकिन समाधान नहीं मिला।
मुख्यमंत्री के हाथों मिला स्वामित्व प्रमाणपत्र
सोमवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पीलीभीत दौरे के दौरान रामचंद्र को मंच पर बुलाकर भूमि का स्वामित्व प्रमाणपत्र सौंपा गया। वर्षों बाद जमीन का मालिकाना हक मिलने से उनके चेहरे पर संतोष और खुशी साफ दिखाई दे रही थी। परिवार के लिए यह किसी सपने के सच होने जैसा पल था।
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खुशियां मातम में बदल गईं
परिजनों के मुताबिक, घर लौटने के बाद रामचंद्र बार-बार जमीन के कागजात देखते रहे। उन्हें इस बात की खुशी थी कि अब उनकी आने वाली पीढ़ियों को जमीन के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। लेकिन मंगलवार सुबह अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई और कुछ ही देर में उनका निधन हो गया। परिवार की खुशियां देखते ही देखते मातम में बदल गईं।
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गांव में शोक, संघर्ष की कहानी बनी मिसाल
रामचंद्र के निधन के बाद पूरे गांव में शोक की लहर है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें आखिरकार न्याय तो मिला, लेकिन उस न्याय का सुख भोगने के लिए भगवान ने उन्हें समय नहीं दिया। उनका 66 वर्षों का संघर्ष अब विस्थापित परिवारों के अधिकारों की लड़ाई की एक मिसाल बन गया है।
रामचंद्र की जिंदगी इस बात की गवाही बन गई कि न्याय भले देर से मिले, लेकिन इंतजार कई बार इतना लंबा हो जाता है कि उसे पाने वाला उसका सुख भी नहीं जी पाता। 66 साल बाद मिला जमीन का हक उनके परिवार के लिए हमेशा गर्व की बात रहेगा, लेकिन उस खुशी को सबसे ज्यादा महसूस करने वाला शख्स अब इस दुनिया में नहीं रहा।