MP के सेठ ने 109 साल पहले अंग्रेजों को दिया था कर्ज, अब वापस मिलेगा कि नहीं?
MP के एक शख्स ने 109 साल पहले अंग्रेजों को कर्ज दिया था। अब इस शख्स के पोते ने एलान किया है कि उन्हें अपने दादा के दिए गए पैसे ब्याज समेत वापस चाहिए।

प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit: Sora AI
मध्य प्रदेश के सिहोर जिले के एक शख्स के पास कुछ कैसे कागज हैं जिनके दम पर वह अंग्रेजों से कर्ज के पैसे वसूलने की तैयारी कर रहा है। 109 साल पहले जितने पैसे दिए गए थे, अब वे लगभग 10 करोड़ से ज्यादा हो सकते हैं। अब कर्ज देने वाले सेठ जुम्मा लाल रूठिया के पोते इन पैसों को वापस लेने की तैयारी कर रही हैं। वह कई कानूनों का हवाला भी दे रहे हैं जिनके तहत वह इन पैसों को लेना चाहते हैं। रोचक बात है कि कर्ज देने वाले शख्स और उनके बेटे तक ने इन पैसों को लेकर कभी दावा नहीं किया लेकिन अब तीसरी पीढ़ी को ये कागज मिले तो लालसा जाग गई है।
63 साल के विवेक रूठिया के हाथ अपने घर में रखे पुराने दस्तावेज़ों को खंगालते वक्त कुछ वसीयत के कागज़ात और प्रमाण पत्र लगे। इसमें कुछ रसीदें भी हैं। दावा है कि इन कागज़ातों के संबंध सीधे ब्रिटिश हुकूमत से थे। पीले पड़ चुके कागज़ात पर लिखी है 4 जून 1917 की तारीख़, जो गवाही दे रही है एक सदी से ज़्यादा वक्त पहले की पैसों के बडे़ लेन-देन की।
क्यों दिया था लोन?
दरअसल, विवेक रूठिया के हाथ लगी रसीद यह बताती है कि उनके दादा सेठ जुम्मा लाल रूठिया ने उस समय की ब्रिटिश हुकूमत को एक बड़ी रकम कर्ज के तौर पर दी थी। ब्रिटिश हुकूमत ने सेठ जुम्मा लाल रूठिया से ही यह रकम इसलिए मांगी थी क्योंकि वह कपड़ों और अनाज के बड़े कारोबारी थे, जो 'सेठ रामा किशन जसकरण रूठिया' नाम से एक फर्म चलाते थे।
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दस्तावेजों के अनुसार, सेठ जुम्मा लाल रूठिया ने कर्ज़ की राशि डब्ल्यू. एस. डेविस को सौंपी थी, जो उस समय ब्रिटिश शासन के तहत भोपाल रियासत में पॉलिटिकल एजेंट के पद पर थे। यहां आपको बता दें कि उस दौर में पॉलिटिकल एजेंट एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और राजनयिक पद होता था, जो क्राउन माने ब्रिटिश राज के प्रतिनिधि के रूप में भारत की स्थानीय रियासतों के शासकों के साथ संबंधों को मैनैज करता था। साथ ही यह सुनिश्चित करता था कि शासन ब्रिटिश सरकार के खिलाफ ना हो।
सेठ जुम्मा लाल रूठिया ने 4 जून 1917 को यह 35000 रुपये का कर्ज़ ब्रिटिश हुकूमत को दिया था, जो आज के दौर में करोड़ों के बराबर हो सकता है। 24 फरवरी 2026 को छपी टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, यह रकम पहले विश्व युद्द के दौरान दी गई थी, ‘इंडियन वॉर लोन’ के तहत। ‘इंडियन वॉर लोन’ ब्रिटिश हुकूमत की एक ऐसी योजना थी, जिसके तहत वह युद्ध के दौरान व्यापारियों, नागरिकों और संस्थानों से धन कर्ज़ लेते थे, ताकि युद्ध के लिए हथियार, सैनिकों के वेतन, सैनिकों का खाना-पीना या युद्ध में इस्तेमाल होने वाले अन्य संसाधनों में कमी ना आए।
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इसी ‘इंडियन वॉर लोन’ का ज़िक्र रूठिया परिवार को मिले दस्तावेज़ों में किया गया है। यहां आपके ज़हन में सवाल हो सकते हैं कि अभी तक ब्रिटिश हुकूमत ने यह पैसा वापस क्यों नहीं किया? तो आपको बता दें कि सेठ जुम्मा लाल रूठिया का निधन कर्ज देने के लगभग 20 साल बाद, 1937 में हो गया। उनके निधन के बाद 1947 में अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए, यानी ये दस्तावेज जुम्मा लाल के बेटे और रोहित के पिता सेठ मानक चंद्र रूठिया के पास सुरक्षित थे, मगर उनका निधन भी 2013 में हो गया।
रूठिया परिवार का दावा है कि इस कर्ज का निपटारा कभी नहीं किया गया और न ही कोई भुगतान वापस मिला। विवेक रूठिया बताते हैं कि उनके पिता ने कभी इस मामले को कानूनी रूप से आगे नहीं बढ़ाया लेकिन अब जब उन्हें ये पुख्ता दस्तावेज़ मिले हैं, तो उन्होंने अपने दादा की विरासत और उनके हक की लड़ाई लड़ने का फैसला किया है।
35000 की एवज में कितना पैसा मिलेगा?
रूठिया परिवार अब इस मूल राशि को सूद समेत वापस पाने की मांग कर रहा है। अगर इसे आज की वैल्यू और महंगाई के हिसाब से देखा जाए, तो यह राशि हैरान करने वाली है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक इसके लिए कई तरह की कैल्कुलेशन बताई गई है—
पहला चक्रवृद्धि ब्याज के आधार पर- 1917 में जारी किए गए कुछ बॉन्ड पर 5.5% की निश्चित ब्याज दर दी जाती थी, यानी अगर 35,000 रुपये पर 1917 से 2026, माने 109 सालों के लिए 5.5% वार्षिक चक्रवृद्धि ब्याज की कैल्कुलेशन की जाए तो यह राशि करोड़ों रुपये में पहुंच जाती है।
दूसरा सोने की कीमत के आधार पर- अगर इस राशि को सोने की कीमतों से जोड़ा जाए तो स्थिति और भी दिलचस्प हो जाती है। 1917 से अब तक सोने की कीमतों में 3,000 गुना से भी ज़्यादा की बढ़ोतरी हुई है। इस हिसाब से उस समय के 35,000 रुपये की कीमत आज 10 करोड़ रुपये से ज़्यादा हो सकती है। हालांकि, ये सारी कीमतें अभी अनुमानित है, फिर दूसरी बात कि ये पैसा मिलेगा कैसे?
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विवेक रूठिया अंतरराष्ट्रीय कानून हवाला देते हुए कहते हैं, ‘कोई भी संप्रभु देश पुराने कर्जों को चुकाने के लिए सैद्धांतिक रूप से बाध्य होता है। इसी आधार पर वह ब्रिटिश सरकार को कानूनी नोटिस भेजने की तैयारी कर रहे हैं।’ हालांकि, टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह इतना आसान है नहीं। कुछ परेशानियों का भी ज़िक्र करते हुए सवाल किए हैं।
परिसीमन कानून- क्या 100 साल से ज़्यादा पुराने दावे को आज अदालत में चुनौती दी जा सकती है?
सोवरेन इम्युनिटी- क्या एक देश की सरकार को दूसरे देश की कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से मजबूर किया जा सकता है?
सीमा-पार अधिकार क्षेत्र- यह मामला किस देश की अदालत में चलेगा और क्या वहां की अदालत का आदेश ब्रिटिश सरकार पर लागू होगा?
ये सवाल तो हैं ही लेकिन प्रोसीजर भी आड़ा है।
कानूनी नोटिस- सबसे पहले उन्हें ब्रिटिश सरकार को एक औपचारिक कानूनी नोटिस भेजना होगा, जिसमें दस्तावेजों के साथ अपना दावा पेश करना होगा।
दस्तावेजी प्रमाण- उनके पास जो 1917 के दस्तावेज हैं, उन्हें अंतरराष्ट्रीय अदालतों में गवाह के रूप में पेश करना होगा।
राजनीतिक मदद- संभव है कि उन्हें भारत सरकार के माध्यम से भी इस मुद्दे को उठाने की कोशिश करनी पड़े, क्योंकि यह अंग्रेजों के जमाने का मामला है।
देखना दिलचस्प होगा कि विवेक रूठिया इन सारे पड़ावों को कैसे पार करते हैं। मगर यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह मामला सिर्फ पैसों का है नहीं। बल्कि उस समय के सामाजिक और प्रशासनिक इतिहास का भी है। बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकारी डब्ल्यू. एस. डेविस सिर्फ एक प्रशासनिक अधिकारी नहीं थे, बल्कि उनका भोपाल में साहित्यिक जुड़ाव भी था। उन्होंने सुल्तान जहां बेगम की लिखी गई नवाब गौहर बेगम की जीवनी 'हयात-ए-कुदसी' का अनुवाद भी किया था, जो 1918 में पब्लिश हुई थी।
इसके अलावा, सेठ जुम्मा लाल रूठिया केवल एक व्यापारी नहीं बल्कि दान पुण्य में विश्वास रखने वाले व्यक्ति भी थे। जुम्मा लाल रूठिया के पोते विवेक ने खुद दावा किया है कि उनके पास ऐसे ऐसे दस्तावेज भी हैं जो बताते हैं कि सेठ जुम्मा लाल शहर में कई आयोजन करवाते थे और उनसे होने वाले लाभ का एक हिस्सा बीमारों और घायलों की मदद के लिए शासन को भेजते थे। फिलहाल तो अभी मामला खबरों में सिर्फ इसलिए है, क्योंकि विवेक रूठिया को दस्तावेज़ मिले हैं, मगर इस कानूनी लड़ाई का पहला कदम तब सामने आएगा, जब वह कानूनी नोटिस भेजेंगे।
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