बिहार की चुनावी राजनीति के सबसे अनोखे और चर्चित चेहरों में शामिल धरती पकड़ नागरमल बाजोरिया अब नहीं रहे। 97 वर्ष की उम्र में पटना में उन्होंने अंतिम सांस ली। वह उम्र से जुड़ी बीमारियों से परेशान थे। उनके निधन की खबर मिलते ही भागलपुर से लेकर पटना तक सामाजिक और राजनीतिक गलियारों में शोक की लहर दौड़ गई। पटना से उनका पार्थिव शरीर उनकी कर्मभूमि भागलपुर लाया गया जहां बरारी स्थित श्मशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया।
चुनाव में जीत हासिल करना हर उम्मीदवार का सपना होता है। कोई विधायक बनने के लिए चुनाव लड़ता है तो कोई सांसद बनने के लिए लेकिन भागलपुर के नागरमल बाजोरिया के लिए चुनाव का मतलब सिर्फ जीत या हार नहीं था। वह इसे लोकतंत्र में अपनी भागीदारी के तौर पर देखते थे। इसी वजह से वह चुनाव दर चुनाव मैदान में उतरते रहे और ‘धरती पकड़’ के नाम से मशहूर हो गए।
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93 की उम्र में तीन सीटों से चुनाव
नागरमल बाजोरिया की चुनावी कहानी का सबसे खास हिस्सा राष्ट्रपति चुनाव से जुड़ा है। आम तौर पर लोग वार्ड, पंचायत या विधानसभा चुनाव से शुरुआत करते हैं लेकिन बाजोरिया ने राष्ट्रपति चुनाव तक अपनी दावेदारी पहुंचाई।
बताया जाता है कि 1969 के राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति वीवी गिरि के खिलाफ नामांकन दाखिल किया था। इसके कई दशक बाद 2012 में जब यूपीए ने प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया तब बाजोरिया ने एक बार फिर राष्ट्रपति चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया। हालांकि तकनीकी कारणों से उनका नामांकन रद्द हो गया था। बाजोरिया का चुनावी जोश उम्र बढ़ने के साथ भी कम नहीं हुआ। 93 साल की उम्र में उन्होंने एक साथ तीन लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ा था।
उन्होंने पुरानी दिल्ली, रायबरेली और पटना साहिब से पर्चा भरा था। रायबरेली से उस समय
सोनिया गांधी
चुनाव मैदान में थीं जबकि पटना साहिब से अभिनेता और नेता शत्रुघ्न सिन्हा मैदान में थे। बाजोरिया के लिए चुनाव सत्ता पाने का जरिया नहीं था। वह इसे लोकतंत्र में आम आदमी की भागीदारी मानते थे। उनका कहना था कि चुनाव लड़ना हर नागरिक का अधिकार है और वह अपने इस अधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं।
लाहौर से भागलपुर आया परिवार
नागरमल और उनका परिवार मूल रूप से पाकिस्तान के लाहौर से जुड़ा था। बताया जाता है कि करीब 1930 में उनका परिवार लाहौर से भागलपुर आकर बस गया था। इसके बाद भागलपुर ही उनकी कर्मभूमि बन गया। भागलपुर के एमपी द्विवेदी मार्ग के रहने वाले नागरमल लंबे समय तक शहर की सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। बाद में वह अपने बेटे के साथ पटना में रहने लगे।
भागलपुर के पुराने लोग बताते हैं कि बाजोरिया बेहद सादगी से रहते थे। वह कुर्ता-पायजामा पहनते थे और अक्सर साइकिल या पैदल चलते दिखाई देते थे। चुनाव के समय वह खुद अपने पर्चे बांटते और लोगों से वोट मांगते थे।
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समाजसेवा में भी आगे रहे
धरती पकड़ नागरमल बाजोरिया की पहचान सिर्फ चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं थी। उन्होंने समाजसेवा में भी काफी समय दिया। जानकारों के मुताबिक, उन्होंने गरीब बेटियों की शादी में मदद की। बच्चों की पढ़ाई के लिए किताबें बांटीं और जरूरतमंद परिवारों की आर्थिक मदद भी की। इलाके में पानी की समस्या को देखते हुए उन्होंने अपने खर्च से कई जगह नलकूप भी लगवाए थे।
नागरमल बाजोरिया की जिंदगी की सबसे खास बात यह थी कि वह चुनाव हारने के बाद भी मैदान नहीं छोड़ते थे। उन्हें चुनाव में वो सफलता नहीं मिली जो ज्यादातर उम्मीदवार चाहते हैं। कई चुनावों में उनकी जमानत भी जब्त हुई लेकिन इसके बावजूद वह अगली बार फिर चुनाव लड़ने के लिए तैयार रहते थे।
उनकी चुनावी यात्रा में हार की संख्या भले ही ज्यादा रही लेकिन लोकतंत्र में भागीदारी का उनका जज्बा हमेशा बना रहा। उनके नाम को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज होने से भी जोड़ा जाता रहा है। उन्हें देश के सबसे ज्यादा चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों में गिना जाता है।