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20 साल की विरासत, नीतीश की विदाई के साथ ही एक युग का हुआ अंत 

नीतीश कुमार के सीएम के पद छोड़ने के साथ ही बिहार में नए युग का अंत हो गया है। अपने कार्यकाल में उन्होंने बुनियादी ढांचे का काफी विकास किया।

CM Nitish Kumar

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, Photo Credit- Social Media

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संजय सिंह, पटना। बिहार की राजनीति में एक लंबे और प्रभावशाली अध्याय का समापन हो गया। करीब दो दशकों तक सत्ता के केंद्र में रहे नीतीश कुमार ने जब मुख्यमंत्री पद को अलविदा कहा, तो यह केवल एक पद का त्याग नहीं, बल्कि एक युग की शांत विदाई थी। बिना शोर-शराबे के, संयमित अंदाज में दी गई इस विदाई के पीछे विकास, सुशासन और सामाजिक बदलाव की एक लंबी कहानी छिपी है, जो आने वाले वर्षों तक राज्य के हर कोने में महसूस की जाती रहेगी।

 

नीतीश कुमार के कार्यकाल की सबसे बड़ी पहचान राज्य में बुनियादी ढांचे का अभूतपूर्व विस्तार रहा। वर्ष 2005 में जब उन्होंने सत्ता संभाली, तब बिहार की सड़कें जर्जर थीं और परिवहन व्यवस्था बेहद कमजोर मानी जाती थी। राष्ट्रीय उच्च पथों की स्थिति सुधारने के लिए उन्होंने केंद्र के इंतजार में समय गंवाने के बजाय राज्य योजना से लगभग 900 करोड़ रुपये खर्च कर हालात बदले।

 

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सड़कों का विकास

पिछले 20 वर्षों में सड़क क्षेत्र में लगभग 1.80 लाख करोड़ रुपये का निवेश हुआ। उनका स्पष्ट लक्ष्य था कि राज्य के किसी भी कोने से राजधानी पटना तक पहुंचने में पांच घंटे से अधिक समय न लगे, जिसे बाद में घटाकर चार घंटे करने की दिशा में भी काम हुआ। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए चौड़ी सड़कों, नए बाईपास, फ्लाईओवर और संपर्क मार्गों का व्यापक जाल बिछाया गया।

 

मुख्यमंत्री ग्रामीण संपर्क योजना के तहत 13,814 नई बसावटों को मुख्य सड़कों से जोड़ने की दिशा में काम हुआ। साथ ही, सड़क और पुलों के रखरखाव के लिए मेंटेनेंस पॉलिसी लागू कर दीर्घकालिक दृष्टिकोण भी अपनाया गया। बिहार राज्य पुल निर्माण निगम ने पिछले एक दशक में 15,583 करोड़ रुपये खर्च कर 882 पुलों का निर्माण कराया, जो राज्य की कनेक्टिविटी को नई ऊंचाई देता है। पटना में जेपी गंगा पथ, अटल पथ, अशोक राजपथ पर डबल डेकर फ्लाईओवर और लोहिया पथ चक्र जैसे प्रोजेक्ट इस परिवर्तन के प्रतीक बने। गंगा नदी पर कच्ची दरगाह से बिदुपुर के बीच छह लेन पुल का निर्माण राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में शामिल रहा।

आइकानिक भवन: आधुनिक बिहार की पहचान

सिर्फ सड़क और पुल ही नहीं, बल्कि आधुनिक और सांस्कृतिक पहचान देने वाले आइकानिक भवनों के निर्माण में भी नीतीश कुमार ने नई परंपरा स्थापित की। पटना में बिहार संग्रहालय का निर्माण आधुनिक वास्तुकला और इतिहास के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके अलावा बापू सभागार, ज्ञान भवन और सभ्यता द्वार जैसे निर्माणों ने राजधानी को नई पहचान दी। पुलिस मुख्यालय का नया भवन और बापू टावर भी इस सूची में शामिल हैं। यह सिलसिला केवल पटना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गया और राजगीर जैसे शहरों में भी आधुनिक ढांचे खड़े किए गए।

संख्या नहीं, नीति बनी ताकत

राजनीति में आमतौर पर सत्ता का रास्ता संख्या बल से तय होता है, लेकिन नीतीश कुमार ने इस धारणा को कई बार बदला। उनके पूरे राजनीतिक सफर में ‘नीति’ हमेशा ‘नंबर’ पर भारी पड़ी। वर्ष 2005 में एनडीए के साथ मिली जीत से शुरू हुआ सफर 2010 में रिकॉर्ड बहुमत तक पहुंचा, लेकिन असली परीक्षा 2015 और 2020 के चुनावों में हुई। 

 

2015 में महागठबंधन के तहत चुनाव जीतने के बावजूद उनकी पार्टी जदयू सीटों में पीछे रही, फिर भी मुख्यमंत्री का चेहरा वही बने। 2020 में तो जदयू को केवल 43 सीटें मिलीं, जबकि सहयोगी दलों के पास अधिक संख्या थी, लेकिन नेतृत्व की कमान फिर उनके हाथ में ही रही। यह उनके कार्य, छवि और राजनीतिक संतुलन का परिणाम था।

 

गठबंधन बदलते रहे कभी भाजपा, तो कभी राजद, लेकिन सत्ता का चेहरा नीतीश कुमार ही बने रहे। वर्ष 2025 के चुनाव में भी उनके काम का असर दिखा, जब एनडीए को फिर भारी बहुमत मिला और वे दसवीं बार मुख्यमंत्री बने।

सामाजिक बदलाव की कहानी

नीतीश कुमार का कार्यकाल केवल भौतिक विकास तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक बदलाव की दिशा में भी कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। शिक्षा के क्षेत्र में साइकिल और पोशाक योजनाओं ने खासकर बालिकाओं के जीवन में बड़ा परिवर्तन लाया। स्कूलों में बढ़ती उपस्थिति ने यह साबित किया कि बदलाव जमीनी स्तर पर हुआ। 

 

स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की मजबूती और मेडिकल कॉलेजों की संख्या में वृद्धि ने आम लोगों को बेहतर इलाज की सुविधा दी। महिलाओं को पंचायतों में आरक्षण और स्वयं सहायता समूहों के जरिए आर्थिक रूप से सशक्त बनाया गया, जिससे समाज में नई चेतना आई।

एक युग का अवसान, विरासत कायम

नीतीश कुमार की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता संतुलन और समावेश रही। उन्होंने हमेशा समाज के विभिन्न वर्गों को साथ लेकर चलने की कोशिश की। यही कारण है कि उनका शासन केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का भी उदाहरण बना। आज जब वे सत्ता से अलग हुए हैं, तो यह केवल एक नेता का जाना नहीं, बल्कि एक युग का अंत है। हालांकि, यह अंत शोरगुल से नहीं, बल्कि खामोशी से हुआ जैसे कोई अपने काम को पूरा कर संतुष्टि के साथ विदा लेता है।

 

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बिहार की राजनीति में बदलाव का यह दौर चाहे जितना तेज हो, लेकिन सड़कों की रफ्तार, पुलों की मजबूती, और आइकानिक भवनों की भव्यता हमेशा इस बात की गवाही देती रहेगी कि कभी यहां एक ऐसा नेता था, जिसने बिना शोर के इतिहास रच दिया।

 

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