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हिमाचल सरकार की आर्थिक मुश्किलें क्या हैं? DA से पेंशन तक समझिए पूरा मामला

सुक्खू सरकार के खजाने पर दबाव बढ़ता जा रहा है। दीपावली से पहले लंबित डीए किस्तों ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

हिमाचल कैबिनेट की बैठक को सबोधित करते मुख्यमंत्री सुक्खू, Photo Credit-DPR

हिमाचल कैबिनेट की बैठक को सबोधित करते मुख्यमंत्री सुक्खू, Photo Credit-DPR

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कर्ज के बोझ तले दबी हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार के सामने दिवाली से पहले लंबित डियरनेस अलाउंस (DA) की दो किस्तों की अदायगी ने मुश्किलें बढ़ा दी हैं। सरकार का यह आर्थिक संकट अब केवल कर्ज और बजट घाटे के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। त्योहारों के बीच सरकारी कर्मचारियों की लंबित महंगाई भत्ते की किस्तें जारी करने की मांग बढ़ती जा रही है।


हिमाचल प्रदेश के पेंशनरों के बकाया भुगतान और वित्त विभाग की ओर से आगामी बजट की तैयारियों को लेकर जारी निर्देशों ने राज्य की वित्तीय स्थिति को फिर चर्चा में ला दिया है। मुख्यमंत्री सुखविदंर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकार के सामने चुनौती यह है कि सीमित वित्तीय संसाधनों के बीच कर्मचारियों और पेंशनरों की अपेक्षाओं को कैसे पूरा किया जाए। विकास कार्यों और जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए भी पर्याप्त धन उपलब्ध कराना है।

महंगाई भत्ते की मांग क्यों तेज हुई?

9 अक्तूबर को हिमाचल प्रदेश अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ ने दीपावली से पहले महंगाई भत्ते की दो लंबित किस्तें जारी करने की मांग उठाई थी। महासंघ के प्रदेशाध्यक्ष त्रिलोक ठाकुर ने सरकार से कर्मचारियों और पेंशनरों को त्योहार से पहले राहत देने का आग्रह किया है। यह मांग ऐसे समय में सामने आई है, जब सरकार पहले ही राज्य की वित्तीय स्थिति को चुनौतीपूर्ण बता चुकी है।

वित्त विभाग ने 8 अक्तूबर को अदालतों से जुड़े मामलों के कारण उत्पन्न होने वाले वित्तीय दायित्वों के प्रस्तावों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत भेजने के निर्देश जारी किए। विभाग ने 2027-28 के बजट अनुमानों और चालू वित्त वर्ष 2026-27 के संशोधित अनुमानों को समय पर भेजने के संबंध में भी निर्देश जारी किए हैं।

यह कदम बजट निर्माण और वित्तीय दायित्वों के प्रबंधन की नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में इनका महत्व बढ़ जाता है। इन घटनाक्रमों को साथ रखकर देखने पर सवाल उठता है कि क्या हिमाचल सरकार के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ संसाधन जुटाना नहीं, बल्कि कर्मचारियों की अपेक्षाओं, कानूनी दायित्वों और विकास की जरूरतों के बीच वित्तीय संतुलन कायम रखना भी है?

सरकार के सामने दोहरी चुनौती क्या है?

महंगाई भत्ते की लंबित किस्तों को जारी करने की मांग सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए सीधे आर्थिक राहत से जुड़ी है। त्योहार के दौरान घरेलू खर्च बढ़ने के कारण इस मांग का महत्व और बढ़ जाता है। 9 अक्तूबर को कर्मचारी महासंघ की बैठक में डीए की दो लंबित किस्तें जारी करने की मांग उठाई गई। महासंघ ने सरकार से आग्रह किया कि कर्मचारियों और पेंशनरों के हितों को ध्यान में रखते हुए जल्द निर्णय लिया जाए। सरकार के सामने यहां दोहरी चुनौती है। एक ओर महंगाई के प्रभाव को देखते हुए कर्मचारियों की मांग है, तो दूसरी ओर किसी भी वित्तीय निर्णय के लिए बजट में पर्याप्त प्रावधान और भुगतान की व्यवस्था आवश्यक है।

 

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पेंशनरों के एरियर पर घोषणा

कर्मचारियों की डीए मांग के साथ पेंशनरों के लंबित एरियर का मुद्दा भी सरकार की वित्तीय प्राथमिकताओं को सामने लाता है। मुख्यमंत्री सुक्खू ने  20 सितंबर को पेंशनरों के साथ बैठक में संशोधित वेतनमान के लंबित एरियर के भुगतान को लेकर घोषणा की थी। इसके तहत क्लास-3 पेंशनरों को 30 प्रतिशत और क्लास-1 तथा क्लास-2 के पेंशनरों को 15-15 प्रतिशत एरियर देने की बात कही गई थी। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख था कि प्रस्तावित भुगतान के बाद भी अलग-अलग श्रेणियों में एरियर का कुछ हिस्सा बाकी रहेगा। इस घटनाक्रम से स्पष्ट होता है कि पेंशनरों के बकाया भुगतान का मुद्दा सरकार के एजेंडे में है। अब यह देखना महत्वपूर्ण है कि घोषित भुगतान की व्यवस्था सरकार कैसे करती है।

 

8 अक्तूबर को वित्त विभाग ने अदालतों से जुड़े मामलों के कारण वित्तीय दायित्व उत्पन्न होने पर प्रस्ताव भेजने की निर्धारित प्रक्रिया के पालन पर जोर दिया। इसके अलावा, 2027-28 के बजट अनुमानों और चालू वित्त वर्ष 2026-27 के संशोधित अनुमानों को समय पर भेजने के निर्देश भी जारी किए गए। बजट अनुमानों का उद्देश्य अगले वित्त वर्ष में संभावित आय और खर्च का आकलन करना है। संशोधित अनुमान चालू वित्त वर्ष में वास्तविक प्राप्तियों और खर्च की बदली हुई परिस्थितियों को ध्यान में रखते हैं।

घाटे में है हिमाचल प्रदेश सरकार?

हिमाचल प्रदेश के बजट 2026-27 में राजस्व घाटा 6,577 करोड़ रुपये और राजकोषीय घाटा 9,698 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के बजट विश्लेषण के अनुसार, राज्य का कुल व्यय, ऋण पुनर्भुगतान को छोड़कर, 50,088 करोड़ रुपये अनुमानित है। वहीं, उधार को छोड़कर कुल प्राप्तियां 40,389 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। इन आंकड़ों से राज्य के वित्तीय प्रबंधन की चुनौती का अंदाजा लगाया जा सकता है। राजस्व घाटे का अर्थ है कि सरकार की राजस्व प्राप्तियां उसके राजस्व खर्च को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। राजकोषीय घाटा कुल प्राप्तियों और कुल खर्च के बीच के उस अंतर को दर्शाता है, जिसे पूरा करने के लिए उधार समेत अन्य वित्तीय साधनों की जरूरत पड़ सकती है।

 

बजट में वित्तीय घाटे को पिछले वर्ष के संशोधित अनुमानों के मुकाबले कम करने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन बजट अनुमान और वास्तविक वित्तीय स्थिति में अंतर हो सकता है। सरकार के सामने चुनौती यह होगी कि वित्तीय अनुशासन में सुधार करते हुए कर्मचारियों के भुगतान, पेंशन, विकास कार्यों और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लिए पर्याप्त संसाधन कैसे उपलब्ध करवाएं।

 

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राजस्व घाटा अनुदान बंद होने से बढ़ा दबाव

हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिति में केंद्र से मिलने वाले अनुदानों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। पीआरएस के बजट विश्लेषण के अनुसार, 2025-26 के संशोधित अनुमानों में राज्य के लिए राजस्व घाटा अनुदान 3,257 करोड़ रुपये था, जबकि 2026-27 के बजट में इस मद के तहत कोई राशि नहीं रखी गई है।

राजस्व घाटा अनुदान में यह बदलाव राज्य के वित्तीय संसाधनों पर दबाव बढ़ाने वाला कारक है। ऐसे में सरकार को अपने राजस्व और खर्च की प्राथमिकताओं का पुनर्मूल्यांकन करना पड़ता है। राज्य सरकार केंद्र से वित्तीय सहायता और पहाड़ी राज्यों की विशेष परिस्थितियों के आधार पर अपनी मांग रखती रही है। दूसरी ओर, विपक्ष सरकार के वित्तीय प्रबंधन और खर्च की प्राथमिकताओं पर सवाल उठा सकता है।

आर्थिक दबाव का असर विकास कार्यों पर 

सरकार की वित्तीय स्थिति का असर जनता को मिलने वाली सेवाओं और विकास परियोजनाओं पर पड़ने लगा है। सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा और स्थानीय विकास से जुड़ी परियोजनाओं के लिए धन जारी न होने की स्थिति में कई प्रोजेक्ट लटक गए हैं। बहरहाल सुक्खू सरकार के सामने चुनौती केवल बजट घाटे को नियंत्रित करने की नहीं है। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना है कि कर्मचारियों और पेंशनरों की जायज मांगों पर समयबद्ध निर्णय हों, कानूनी दायित्वों का आकलन किया जाए और विकास कार्यों के लिए संसाधन उपलब्ध रहें। कुल मिलाकर दीपावली से पहले डीए की लंबित किस्तों की मांग, पेंशनरों के एरियर के मुद्दे ने सरकार को संकट में लाकर खडा कर दिया है।


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